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Wednesday, February 26, 2014

कि पधारो हमारे देश …… पर लंगोट पेहने न आना






कि भैया पीछले कुछ हफ्ते व्यस्तता का बहुत भारी आलम रहा ,वो क्या है न बड़की दीदी कि शादी हुई और वो चली गयी परदेश  … पर जाते जाते हमका दे गयी सन्देश कि " मे वापस आउंगी " एकदम कड़क लहजे में  .... और हुआ भी ऐसे ही   .... ऊ अगले ही रोज़ वापस घर चली आयी  …   बोले तो  मायेके  …। कुछ बाकी रह गयी रश्मो रिवाज़ों को पूरा करने   .... और उनके साथ मे थे चमचमाते सूट मे हमरे जीजाजी। ,,मतलब भूतपूर्व   दुल्हे राजा ,जो एक रोज़ पूर्व किसी बहुत बड़ी रियासत के राजा न सही    …पर एक शादी के दालान के भूपति नज़र   आते थे  वो आज मात्र पति की  भुमिका   में थे।  हाँ इस बात का एक अनकहा सुकून उनके चेहरे पर ज़रूर था कि उपहार स्वरुप आज उनके साथ उनकी धरमपत्नी थी।  ख़ैर जो भी हो वर वधु पहली रोज़ हमरे घर पधारे  तो उनका अपेक्षित स्वागत सत्कार हुआ। नज़ाकत के साथ दोनों घर में परविस्ट  हुए।

अजी आप सोच रहे होंगे हम इतनी भुमिका बाँध बेठे हैं वर वधु के  इर्द गिर्द तो हमारी कहानी के मुख्य पात्र ये नव विवाहित जोड़ा होगा  …पर नहीं जनाब ऐसा बिलकुल भी नहीं है ,,, इस  कहानी के मुख्य पात्र हैं "हम '… अजी हाँ ठीक सुना आपने  हम।

शादी  के अगले दिन सुबह १०  बजे   …

बहार झमा झम बारिश का पोल डांस अंगड़ाइयां भर रहा है। सबकी निगांहे घडी पर एक टक  साधी हुई   … इंतज़ार मे हैं तो बस उनके  …,,,,,, और लो नाम लिया और वो भी हाज़िर    .....दूर से एकदम छर छरी कद कांठी ,छुआरे जैसी शक्ल ,हाथ मे छतरी और काँधे पर झोला लिए विष्णु जी का वामन अवतार अवतरित हुआ  ,,,,, अजी हुआ क्या जबर्दस्ती बुला लिया गया   "राधेश्याम पंडित जी" . जैसे ही पंडित जी द्वार तक पहुंचे सभी ने एकमत होते हुए अपनी बलखाती कमरों को चरण स्पर्श कि मुद्रा मे झुका दिया। ओरतों के इस  खूबसरत समूह ने गजब कि कला का अनूठा नमूना पेश किया   … श्यामक डाबर भी उस वक़्त होते तो सर्टिफिकेट थमा जाते इस  ग्रुप को. । अजी घबड़ाने का नहीं पंडित जी कहीं नहीं गए   ....... वो लगातार बने हुए इस  कहानी में ठीक हमारे  बगल में खड़े धोती संभाल रहे हैं. ।वो भी अंदर घुसने कि फिराक में हैं। . लो धक्का लगा और वो अंदर  …। सभी के साथ पंडित जी ने अपने चिर परचित अंदाज़ में फुर्ती के साथ स्थान ग्रहण किया  … दे तपाक  से सारी  पूजा सामग्री ज़मीन  पर बिखेर दी   फिर शुरू  हुआ उनकी कथावाचक कि भूमिका का सिलसिलेवार  क्रम। सबने हौले  से अपने अपने आसान ग्रहण किये और भगवान् कि ओजस्वी तस्वीर को (  लड़ी वाली तस्वीर  थी इसलिए फ़ोटो में ओज कुछ ज्यादा था ) यथा स्थान  स्थापित कर शुरुवात मे ही भगवान् को दर्ज़न  भर केले का भोग लगा दिया।  पिताजी ने भी प्रभु को सहानभुति  स्वरुप  सो रूपए बेहिचक ठेल दिए.  हमारा तो कलेजा गले तक आ गया और हाथ सीधे अपने पतलून में पड़े  मात्र २० रूपए पर जा टकराया। हम जानते थे ये मात्र शुरुवात  भर है ,,,, पिताजी के जैब में खनकते आखरी सिक्के कि गूंज तक पंडित जी का मंत्रो उच्चारण जारी रहेगा। …....... खैर इस  दौरान एक घटना और घटी  …… ज्यूँ ज्यूँ पंडित जी का मन्त्रों का स्वर त्वरित और भावपूर्ण होता गया  मुझे नज़ाने क्यूँ अपनी   औनी पोनी सारी डिग्रीयां कूड़े का ढेर प्रतीत होने  लगी। . या यूँ कह लो बेज़ज़ती  के घूंट दना  दन  हलाहल ज़हर कि भाँती हमारे  गले में उतारे ज़ाने लगे. …   पंडित जी संस्कृत में हमारा गला घोंटने पर आमादा थे।  वहाँ मौज़ूद बेठा हर एक व्यक्ति हर मंत्रो उच्चारण पर पेहले तो आध पोन किलो थूक गले मे उतारता  फिर पंडित जी के आगे गर्दन शुतुरमुर्ग कि भाँती झुका देता  अजी इतनी इज़ज़त तो गवर्नर को भी नहीं मिलती।  बेकार इतना ज्ञान जमाल घोंटे  कि तरह पी गए हम । कुछ लोग तो ये भी कहते है तुम्हारा कद उसी का साइड इफ़ेक्ट है। पर ये सब घटा घटनाक्रम अभी मात्र अंश  भर था ,कार्यक्रम का ये अभी शुरुवाती  भाग था।  कार्यक्रम के अगले भाग के प्रायोजक स्वंयं पंडित जी थे.

घडी में सुबह ११. ३० बजे कि उपस्थिति है
और ये शुरु  हो गयी सत्य नारायण जी कि कथा।  कथा का स्थान सुनियोजित तरीके से सजाया गया था ,इसके रण नीतिकार  भी स्वयं पंडित जी थे। . पहली पंक्ति में मौज़ूद थी दीदी और जीजा जी ,,,,उनके ठीक बगल में थे बड़ी दीदी और बड़े जीजा जी  ,दूसरी पंक्ति कि कमान माँ  और उनकी कुछ कट्टर भगवान् भक्त महिलाओं ने थाम रखी थी   ,,,,,,,,, सर मे पल्ला और हांथो में अपने घर का पूरा गल्ला रखा हुआ था ,,,,,पंडित जी का चाँद जैसा मुह  महिलाओं के हाथो में रखे चंदे  को देख तारों कि तरह टिमटिमाने लगता ,,,,,,,,,,……ओर  तीसरी पंगति में मौज़ूद थे हम और हमारे  पूजनीय पिताजी जो अब तक भगवान  को उनकी छाती तक फलों और पैसों का मचान खड़ा कर चुके थे. (इससे ये कत्तई अंदाजा मत लगयाये कि पिताजी हमारी किसी अकूत सम्पदा के मालिक हैं ).

बेटा  ये कलयुग है घोर कलयुग  …,,,,,,,,  पंडितजी ओजस्वी स्वर में
जब कलयुग का वर्षफल पूरा हो जाएगा जो कि एक लाख साल है तो पृथ्वी का विनाश होगा  और सभी लोग (हिंदुओं पर जोर देते हुए )उस गाँव  कि और रवाना होंगे जहाँ वो सुरक्षित रहेंगे ( गाँव का नाम भूल गए वरना अब तक प्लाट कटवा चुके होते  अपने नाम का).
पंडित जी बाकी लोग , मेरा मतलब मुस्लिम, सिख, ईसाई  समुदाय के लोग कहाँ जायेंगे  …… हम बोले
वो कुछ देर  निरुत्तर हो गए  .... और फिर संभलते  स्वर में बोले    ……वो भी वहीँ जायेंगे  ....
पर वो लोग सायद ऐसा नहीं मानते   ।..हमने अल्फाज़ टपकाए
पंडित जी ने इस बार घोर अपमान का घूंट पिया और बात दूसरी दिशा में पलट दी  … माँ ने मुझे  आँखों  ही आँखों में चुप रहने का इशारा  किया

अगली कहानी भय के ऊपर थी  ,,,.... पर हमे भय से ज्यादा  ख़ुशी हो रही थी कि अब तक प्रभु को  लगाया भोग प्रभु ने चख  लिया होगा क्यूंकि फलों का मचान अब भगवान कि  छाती से मुह तक आ टकराया था.
जिस दिल में भय  होता है वहाँ प्रभु का वास नहीं होता  …… भयमुक्त पंडित जी गुर्राए
हम ये पूजा क्यों कर रहे हैं  …लो फिर बीच में ऊँगली कर गए हम
बेटा सारे दुखों से मुक्ति के लिए  …… अतिआत्म विश्वाशी  पंडित जी अगले सवाल से बेखबर
आपको दुखों का भय है और इसमे भगवन क्या करेगा ,,,,, ऐसा नहीं कहते बेटा  भगवन का पाप लगेगा  ,,सभी लोगों कि नज़र मेरे ऊपर आकर गड़ गयी  मतलब आपको भगवान् का डर है ? …।
 वह सर्व शक्तिमान है  हमे उससे डरना भी चाहिए और भक्ति भी करनी चहिये  …   वह बोले
तो अभी तो आपने कहा जिस ह्रदय में डर कि चिड़िया बेठ गयी वहाँ प्रभु का पक्षी कभी वास नहीं करता। . पण्डित जी के चेहरे पर पड़ी झुरियों से इस  बार डर  कि गंगा जमुना ओवरफ्लो  हो गयी  ,,,। पिताजी हम पर   गुर्राए जाओ चाय बना  कर लाओ  । हमने  चाय बनाने के लिए किचन कि ओर प्रस्थान किया  …सबने  राहत  कि सांस ली।  पर चाय बनाने कि परक्रिया के दोरान भी हम पंडितजी के स्वर कुछ हद तक सुन सकते थे।
प्लेट प्यालों कि आवाज़ के बीच जो हुमने सुना वो कुछ यूँ था। . बेटा  नास्तिक है इसका शनि  चौथे स्थान पर है , और शुक्र दसवे पर है  इसलिए कुबुद्धि हो गया है. बेटे को जल चढ़ाने को बोलना शिवलिंग पर। । तभी हम चाय लिए प्रस्तुत हुए।   पंडित जी  ने हमे तर्राई नज़रों से देखा और ठीक वैसे ही माँ कि प्रभु भक्त मीराओं ने। .पूजा अब अपने  समापन कि ओर  थी।   पंडित जी  अंतिम कथा कि और अग्र्सर  हुए। बोले सतयुग और द्वापरयुग क्या युग थे  उन युगों में लोग कथा करके थे तो बड़ा फल मिलता था। . ……
....... अब क्यूँ नहीं मिलता इस  बार सवाल हमने  नहीं दीदी ने पूछा था।  वो बड़ी तल्लीनता  से और सौम्यता से बोले क्यूंकि अब लोग दूषित  हो चले हैं।  धर्म ,कर्म  के काम से विमुख हो रहे  हैं. मीट ,मदिरा , धूम्रपान का सेवन कर रहे हैं इसलिए। ।बोलो सतयनारायण भगवन कि जय। …।  और हवा में जय हो का नारा गूंज उठा।

कुछ हो न हो पंडित जी कि आखरी बात से हम बड़ा अभिभूत हुए और फिर उस होली वाटर (चरणा अमृत ) को हमने  कई कई बार गटका और पूजा समाप्त।  पूजा निर्धारित समय स पेहले समाप्त हो गयी यानि ३. ३० बजे.पर नज़ाने  क्यूँ पंडित जी कि  आँखों में मेरे लिए अपनत्व तैर गया  ,अपने पास बुला कर बोले जरा माचिस ले आना  … हम भी तुरंत ले आये  बोले बेठ जाओ  .... वह स्वंय कुर्सी पर विराज़े और हमे हाथों  से ज़मीन  पर बेठने का इशारा कर गए। हम बेठ गए।  बेठते साथ ही बोले भगवन को नहीं मानते।  मेने कहा मानता हु ऊपर वाले को  …। पर चार हाथ और चार सर वाले को नहीं। अब तो पंडित जी बिलबिला उठे जैब में हाथ डाल बीड़ी का बंडल निकाला और बीड़ी तुरंत जला मुह में सटा दी।  हमे तो कलयुग याद आ गया उनके ज्ञान का आखरी स्तम्भ भी धराशाही हो गया  …बोले तुम  कुतर्की हो
इस  बार हमारी आवाज़ में तल्खी थी। …हर सवाल कि प्रासंगिगता होती है पंडित जी  ओर ये कहते साथ ही हम वहाँ से उठ गए। अंतिम रूप से विदाई लेने के उपरान्त सभी ने उनके चरण स्पर्श किये सिवाय हमारे। उन्होने अपना झोला उठाया जो कि अब पहले से काफी भारी था ,फलों का मचान अब समतल ज़मीन हो चला था. वीरगति को प्राप्त एक आत फलों के अंश वहाँ हुए कृत के साक्षी थे।  पैसें भी नदारद थे. .... शायद भगवान  को भेट लग चुकी थी। …

खैर माँ ने खूब खरी खोटी सुनाई  हमे बोली उम्रदराज़ थे वैसे ही चरण स्पर्श कर लेता   …लगा सायद गलती हो गयी हमसे हमे पैर छू लेने चाहिए  थे   ,,,,,, … पर अचानक नज़र सेल्फ में पड़ी दारुओं कि बोटल  पर लिखे स्लोगन पर पड़ी जो कुछ यूँ था " हैव आय मेड इट लार्ज " पर गोर करने वाली बात ये नहीं थी  बात यह थी कि अब दारुओं कि बोटल मात्र आठ रह गयी थी।  जो एक घंटे पूर्व दस थी।
हमारे मुह से प्रक्षेपात्र कि तरह तुरंत ये वाक्य निकला। …"यस  आई हैव मेड इट लार्ज ". पंडितवा। ....


जय हो ऱाधे श्याम तिवारी। ....... (तनिक आइयेगा आप भी पंडित जी के दर्शन अभिलाषी  )













Saturday, January 4, 2014

आखरी दस्तक




वो बहुत देर तक  अपने को आदम कद  सीसे के आगे खोजता रहा। … वही अनुराग जो वो आज से २० साल पहले था।    अपने प्रतिबिम्ब को लगातार निहारता  ……  बगल वाले कमरे कि आवाज़ से बेखबर अनुराग बस अपने भविषय को लेकर बेहद कुंठित था  …। जानता है वो इस  मुददे पर जितना सोचेगा उतना दुखी होगा। कमरे कि घडी रात के  नौ  बजा चुकी है  ....बहार हवा के तेज़ झोंके चल रहे हैं   आज तूफ़ान आएगा ये वो बेहद अच्छी तरह जानता है   ,,,उसने खिड़कियाँ इरादतन बंद नहीं कि हैं। .... अनुराग लगातार खुश होने कि कोशिश कर रहा है।   दरवाज़े पर किसी की दस्तक उसके ध्यान को तोड़ती है  … पर वो फिर अपने  काम मे मसरूफ  …  टेलीविज़न ऑन करता है  … बार बार कुंठित मन शांत होने  का नाम नहीं ले रहा।  बहार बैठक मे कुछ लोग प्रविष्ट हो  चुके है।  इस बात का आभास उसे बखूबी है.  किचन मे अलग तरह के खाने कि सुगंध , करछियों और नए बघोनो कि आवाज़ बदस्तूर ज़ारी है।  पर अनुराग बस मुट्ठी  भींचे पसीने पसीने हुआ जा रहा है। … बैठक का कोलाहल अब पहले  से ज्यादा  हो चला है।  मोबाइल स्क्रीन पर नंबर फ़्लैश होता है। अनुराग झट से काट देता है।  फ़ोन मधु का था। … उसे फ़ोन उठाना चहिये था। वो परेशा न हो जाता है।  मधु का नंबर मोबाइल स्क्रीन पर फिरफलैश होता है।   इस बार बिना देरी  किये उसने फ़ोन उठाया  है। … इस बार तुम्हे अपने माँ बाप से बात करनी ही होगी  … गुस्से और फ़िक्र से भरी मधु अनुराग को बहुत कुछ कह गयी    । पर अनुराग दिल और  दिमाग को बंद कर बस एक टक खिड़की कि तरफ नज़र गड़ाए बेठा है. .... तूफ़ान कि गति लगातार बडती जायेगी। । न्यूज़ के वक्ता  हुंकार भर रहे हैं। मधु का फ़ोन ओके   …ओर आल द  बेस्ट के साथ सवयं निरस्त हो गया।

अनुराग पहले से जानता था वो अलग है  ,चुप चाप अपने काम के प्रति रूचि रखने वाले  अनुराग के कभी भी कुछ ख़ास दोस्त नहीं रहे  … बस कहने को इक दोस्त थी "मधु" जिससे वो खुल कर बात किया करता था  … एकलौता होने  के कारण उसके अकेले पन को दूर करने का ज़िम्मा मधु अपनी ज़िमेदारी समझती  थी। …।    वो अनुराग कि नज़र में दोस्त से कुछ ज्यादा थी। घडी अब साढ़े नौ बजा चुकी है। बेटा तैयार हो जाओ  वो लोग काफी देर से बैठे हैं , तुम्हारे ही दफ्तर से आने का इंतज़ार कर रहे थे। … वैसे कब आये तुम  माँ  बोली ,  अभी पीछे के दरवाज़े से  ।अनुराग झूठ बोल जाता है। ठीक है जल्दी तैयार हो जाओ ,मे सबके लिए खाना  लगा रही हु

 तूफ़ान अब हद से ज्यादा तेज़ है।  उसे  लगता है अब खिड़की बंद करने का वक़्त है मगर बाहर मेहमानो का शोर एक अजीब सी शान्ति कि ओर रवाना हो चूका है। . उसकी इच्छा तो  थी कि वो ऐसे ही चला जाये थका मांदा चेहरा लिए ,भूख तो वैसे ही मर चुकी थी पर क्या करे उसे रह रह कर मधु कि बात याद आ रही थी उसे आज हिम्मत करनी होगी  ,,,उसने अपने  पसंदीता गुलाबी धारियों वाला स्वेटर पहना और डाइनिंग हॉल कि ओर बड़ गया।  हेलो बेटा एक अधेड़ उम्र कि संभ्रांत महिला ने बड़े सधे हुए अंदाज़ मे बोला। अनुराग मुस्करा के  बोला" हेलो" ।  बेटा ये मिस्टर अग्रवल है। पिताजी बोले  ।ओर ये उनकी मिसेज़ हैं।   अनुराग कि नज़र पास बैठी उनकी बेटी पर पड़ी ।  वो बेहद खूबसूरत थी  और आवाज़ तो उससे भी दिलकश। मिसेस अग्रवाल तपाक से बोल पड़ी she is my daughter रौशनी  , C. A  है। अनुराग धीमे से बोला हेलो। फिर कुछ देर  टेबल पर सन्नाटा आकर पसर गया।  छुरी  चमचों कि आवज़ साफ सुनी जा सकती थी. … अनुराग कि जहन मे मधु कि बात  रह रह अपनी उपस्तिथि दर्ज़  करा करा रही है. …। किसी किताब में लिखी कुछ पंक्तियाँ अनुराग बार बार दोहरा रहा है "रूह एक यातना शिविर है जहाँ कैद हज़ारों ख़याल अपनी आज़ादी कि इच्छा पाले बेठे हैं।  इससे पहले अनुराग अपनी बात कहता ,मिसेस अग्रवाल पहले  ही बोल पड़ी बेटा अनुराग जाओ रूम में बैठकर रौशनी के साथ बात करो।  और फिर जोर से  हंस दी  ,.... अनुराग के दिमाग मे तो जैसे बवंडर मच गया। अब तक इतनी बात तो अनुराग को साफ़ हो चली थी कि अग्रवाल दम्पती यहाँ किसी और कारण वश नहीं बल्कि उसकी शादी कि बात करने आये थे।इस से पहले  वो  कुछ और बोलते अनुराग तपाक से बोल पडा। पिताजी मे ये शादी  नहीं कर सकता। . सबके  दरमियान कुछ देर शान्ति पसर गयी।  बेटा  any  problem
पिताजी बोले। …अनुराग ने एक लम्बी गहरी सांस  ली ,फिर  अंदर उठते द्वंद को   समाप्त किया और जल्दी से बोला। ....पापा i  am different   ,.... खिड़की पर बहार बिजली ने अपनी आखरी मोज़ूदगी का अहसास कराया। …… और अनुराग ने दैहिक द्वन्द को खोल स्वयं को नर नारायण घोषित  कर दिया।    समलैंगिगता  को उजागर करना उसके लिए कतई आसान नहीं था  पर उसने वो किया जो उसके दिल न कहा। तूफ़ान अब शांत हो चूका था। घडी अब ११ बजा चुकी थी। । अग्रवाल फैमिली  बड़ी तेज़ी से गर्दन  झुकाये वहाँ से निकल गयी।  रौशनी के मन मे अभी भी  अनुराग के लिए प्यार था। पिताजी गुस्से से  कमरे में चले गए।  टेलीविज़न कि आवाज़ फुल वॉल्यूम में कर दी है  सायद अपने अंदर  आती हींन आवाज़ों को वो दबा देना   चाहते थे।    उधर टी वी  पर खबर दौड़ रही है "समलैंगिगता पुनः अपराध कि श्रेणी में ".

अनुराग के मन में बस एक नयी उर्ज़ा है जैसे सजायाफ्ता  कैदी के मन मे आज़ाद होने के ख्याल भर से होती है ।



      








Tuesday, December 24, 2013

कि छोड़ दे हाथ ;उन बोनी उमीदों का
जिसके ठीगने कदमो का हर रोज़ उपहास उड़ता है.
फंसा के देख उँगलियाँ ;उन सूखे खेतों की दरारों पर .
जहाँ चटकती हड्डियों का इतिहास रहता है.

हर रोज़ वहाँ गरजते बादलों से अब सिहरन नहीं होती .
तेरे घर मे मेरी चमड़ी का ; एक नक्काशीदार लिबास रहता है .

मेरी बची हड्डियों का चाहे तो खुशबूदार झूमर बना देना .
इन हड्डियों मे ज़मी राख मे मेरा फिसलता खवाब रहता है.
और रह जाए कसर कोई फिर भी .
तो मेरा बेटा तेरा कर्जदार रहता है .

बचे रहना ज़ब तक बचो मेरे बच्चो.
पड़ोश के उस घर मे ज़मीदार रहता है. 
हाँ इज़ाज़त है तुम्हे मेरे ज़ख्म तक ज़ाने कि ;
क्यूंकि अभी इन आँखों मे बहुत पानी है
भले टूटी हो कलम मेरी ;डायरी के तीसरे पन्ने पर ;
मगर दिल के अजायबघर मे अभी सेकड़ो कहानी हैं. 

Thursday, July 18, 2013

वो बड़ी अजीब हरक़त करता है१ 
खुदा तेरा मेरे गमो मे हर रोज़ सिर् कत्त करता है 
चला जाता है अक्सर उसकी दहलीज़ पर 
जिसकी दुकानों पर वो हर रोज बिका करता है 

लग गयी कस्तियाँ मेरी सोच की किनारे पर 

क्या लिख दिया तुने ओ नाविक इन तरंगो पर 

मे छोड़ आया वो छल्ली रूह 

तेरे नाव के मुहाने पर 

Thursday, June 27, 2013

 आ  अपने अपने आसमान मे कुछ उमीदे उछाले
बादलों के कान मे मोर पंख  डाले
छोड़ आये उम्मीद के कुछ बीज उसकी क्यारी मे भी
चल फिर चुपके से हंसती ज़िन्दगी को निहारे