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Friday, January 6, 2012

कबाड़ से मिला कुछ कीमती सामान...




 सर्दी ने खुद अपने कसीदे पड़े हैं
लिफाफे में पडी कुछ रूठी और बेतरतीब बेठी यादें जिन्हें मेने तह कर के रखा था .... 
उस दवात में ज़मी वो गाढी अधूरी स्याह्ही
 उस रोज़ मेरे गुस्से का शीकार हुई कलम की निब
मेरे हाथो पर खरूंचे मार कर अपने होने का  अहसाह कराती वो मेज़ की  आवारा कीलें
वो बेसुद पड़ी क्रांती की  कुछ किताबे
झूट फरेब से टकराने को मेरे वो   कुछ अल्हड मिजजाज़ी ख़याल
मेरे मासूम खयालों का  चालाकी का  वो जादूगरी   चोगा
गुम होता कोई मेरे याद का  ज़रूरी दस्तावेज़
कई ज़ेबों वाली   वो मेरे जे कट   में खोई मेरे किसी नए नन्हे पेन की याद
 दू धिया रोशिनी वाला सुनसान खाली  पेन का होल्डर ,
जो बड़ा बवंडर लिए फिरता था नए लाल , नीली कलमों का
उसकी चुपी ,ओर
  मेरी हाल्फ   आस्तीनों की शर्ट का  झगडा आज भी मेरे पुरानी बाजुबंदू के साथ
घर में बीछायी  पुरानी पायदानों का झुक चुका कन्धा ,,
हरी भरी याद की सूख चुकी   झाडियों में मिला मेरा पुराना क्रिकेट बाल  
खिडकियों   पर  ज़मी  वो पुरानी  आवारा धुल
खुद से छुपाया मेरा कोई राज़  
उस रोज़ की आख़री शाम में अपनी ही याद के छुटे किसी धागे से खुद ही उलहज जाता सूरज 
ये सब बाट जो रहे थे किसी कलम की और एक यादो के किसी  उजले कागज़  की
पुराने साल के  कई धुल  भरे पैरों ने जैसे अपने सभी निसानो को खुद  ही साफ़ किया है

सायद नया साल आया है मेरे बागीचे में



 



 

Saturday, November 26, 2011

.....



जीने के बहाने....





सुबह सुबह अलार्म की घंटी बजी है....में बंद करने के लिए उठता हु.....पर उठ नहीं पाता .अपना ही सर का बोझ नहीं उठाया जा रहा है......लगता है गर्दन ने रात भर किसी  के साथ कुस्ती की है....माँ.... में चीखता हु ...मगर आवाज़ भी हलक के अंदर ही मरे जा रही है...में खुद ही उठ कर कोई क्रिम ढूंड रहा हु ....क्रिम लेता हु और गर्दन पर मल देता हु....इस क्रिम की  खुसबू  मुझे काफी अच्छी लगती है ऐसा  में अपने आप  से कई बार कह चूका हु ...सुबह के साथ बजे हैं ...आज कॉलेज की छूटटी समझो....मन में  ये ख्याल बड़े ही धीमे से बोल  रहा है ,मै  रजाई के अंदर मुह दबा कर एक और सपना देखने की कोशिश में हु ....घडी का दूसरा सेट किया अलार्म भी बज चूका है....में  अपने बिस्तर को संभालता धीमे  से बाथरूम की ओर हो लेता हु.....नीद में  झूमती मेरी  आँखे और सुसताते मेरे हाथ टूथ ब्रुश को नजाने मेरे मुह पर कहाँ कहाँ  भीड़ा रहे हैं ..सब निबटाते मुझे  11 बज ही जाते हैं.....फ़ोन की घंटी बजी है ....महेश है..... कॉलेज के  फर्स्ट इयर में मिला था  मुझे .....मुझे अस्पताल जाना है सर्टिफिकेट लेने....जल्दी पहुँच......वो कहते साथ ही फ़ोन काट देता है ....महेश का अभी आर्मी में सेलेक्शन  हुआ है....में फटा फट थाली में भीगाये दो मुठठी  काले चने उठा चल देता हु.......में रास्ते में हु...महेश कई बार फ़ोन कर चूका है.....में ठीक 12 बजे उस तक पहुँचता हु...वो मेरा सरकारी अस्पताल की  पुरानी बिल्डिंग के  बहार इंतज़ार कर रहा है ...अपना बैग मेरे हाथ में थमा वो ......लम्बी लाइन में लग जाता है......साला सुबह सुबह कहा  ले आया.....अस्पताल  से आती सैकड़ो तरह की बदबुओं से  तो दम निकला जा रहा है...में महेश को मन में कोस रहा हु.......ताज़ी हवा लेने में बिल्डिंग से बहार लॉन की तरफ  हो लेता  हु.......उफ़ ये गर्दन का दर्द तो मेरी  मुलाक़ात आज यमराज से करा ही देगा ..आधा पौन घंटा हर चीज़ को कोसता में चहल कदमी   कर  अपनी  कोफ्त हर  चीज़ पर निकालता  रहा....अपने हाथ में रखे उस बैग को तकरीबन मेने फाड़ ही  दिया है..........में अपनी नज़रो को ज़बरदस्ती अनज़ाने चेहरे पर केन्द्रीत कर रहा हु......सायद कोई जाना पहचाना मिल जाए.......वैसे भी अपने ही सहर  में जब सब चेहरे नए हो तो सहर भी अपना कोई दूर का रीसतेदार लगता है......आडी तीर्छी घुमती मेरी  नज़र एक चेहरे पर  आकर रुक गयी .....dermatalogist  डिपार्टमेंट के  बहार खडी पीले suit  में वो लड़की वहीँ लगे किसी पोस्टर को बड़े गौर से पड़े जा रही थी....




मेरी नज़र बहुत देर तक उस पर टिकी  रही ...... मै  उसे लगातार पहचान नै की कोशिश कर रहा हु ......ये मुई  याद दाश  को भी क्या हो गया है में अपने हाथ पर रखे बैग को  खुद के सर पर मार देता हु ......काफी देर से खडी उस  लड़की को देख मन ठहर सा गया ....वो अब फ़ोन पर किसी से


बात कर रही है  ......नजाने कौन है  .में उस पर  ध्यान हटाकर   मुड़ने की


कोशिश में हु......उस धुंदली याद ने मेरे दिमाग पर फिर से एक  ज़ोरदार प्रहार किया है..........प्रेयर  के वक़्त लड़कियों  की लाइन में तीसरे नंबर पर खडी होने वाली   लड़की थी वो ...उसका चेहरा मुझे  मेरे दिमाग के तहखाने से मिले किसे अधूरे अभिलेखों के तरह लगा जिसमे कुछ फटे पुराने कागज़ के टुकडे रखे  हैं अधुरी सुचना के साथ  ...नाम के साथ मेरा मन अभी भी खिलवाड़ कर रहा


है...."साक्षी"......."संध्या".या ..."सुरभि'.... अपनी यादों के अखाडे  में कई पुरानी यादों को पठ खनी देने के बाद आखिर कार मुझे  उसका नाम याद आ ही  गया सुरभि था उसका नाम


.......पहली बार मेरी मुलाक़ात उससे नवी क्लास में हुई .......वो हमारी  क्लास में नयी थी ...फ्रेश मुर्गा आया है ...किसी भी नए  बच्चे  के आने पर हम चुटकी लेते  थे  .....गर्मी  की छुटीयों के बाद एक नए चेहरे ने ज्यों ही क्लास में परवेश किया तो पीछे से एक जानी पहचानी आवाज़ ने अपने अंदाज़ में कहा.........सुरभि जाओ वहा  बैठ जाओ क्लास teacher ने मेरी  ओर इशारा करते हुए  कहा था   .....वो मेरी row  में मेरी ओर बड़ते हुए ठीक मेरे  पीछे वाली सीट पर एक बहुत ही वज़नदार  शरीर    वाली लड़की के साथ  बैठी थी ....मेरे चेहरे पर एक बचपन वाली हंसी छूट आयी  थी...वो खुशकिस्मत थी ..ऐसा मै  नहीं मेरे साथ के सब उत्पाती बच्चे जानते थे ......आखिर वो हमारी क्लास की मोनिटर के साथ   बेठी  थी ...........मोनिटर की कैमरे जैसे निगाहों ने एक बार हम सब उतपाती  बचचौं पर नज़रे  फिरआयी  हैं ..और बिना कुछ बोले ही सख्त हिदायतओं के फरमान ज़ारी कर दिए ..." अब आप मोनिटर की होने वाली दोस्त को  देख भी नहीं सकते  ऐसा वो अपनी छोटी आँखों को बड़ा कर कह रही थी ..... पर उस दिन हम सब विद्रोही थे हम सबने उसे पहले से ज्यादा गौर से देखा खूबसूरत और सौम्य चेहरे वाली उस लड़की की आँखे जिस जिस  पर टकराई उन सब की  दोस्ती को उसने मूक सहमती दी ...बहुत जल्द ही उन दिनों वो teachers की चहेती बन गयी ...अब तो क्लास को चुप करना का ज़िम्मा भी कभी कभी  उसे मिल जाता था....


 इस बार साइंस एक्सिबिशन  में तुम जाओगी ...हमारी साइंस  टीचर  ने अचानक से ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिखते हुए पलट कर ये बात कही थी ......हम सब पहले की तरह  ही अपनी बत्तीस्सी दिखाए हंस रहे थे....प्रतीक  ने मुझे  एस बात पर जोर से कोहनी मारी है.....वो इस बात से बेहद नाराज़ था ..वो हमारी क्लास का स्कॉलर था ।और हर कॉम्पिटिशन में उसका नाम लिया जाए उस को  ये आदत डलवा दी गयी  थी ..उस दिन वो मुझ पर बहुत बीफरा ,,तू बता यार कौन डीसर्व करता है इस कॉम्पिटिशन के लिए वो मशीन गन की तरह मुझ  पर सवाल दाग रहा था....में नहीं करता क्या?.... वो ऐसा कई  बार बोल चूका है ......... में उसकी बात अनसुना कर चल देता हु .......महीने चन्द मिनटों की तरह .ऐसे ही देखते देखते निबट गए और  हमारे मिड टर्म भी निकल गए ........प्रतीक  ने एस बार भी टॉप मारा है वो खुश है ......में ठीक ठाक नम्बरों से पास हो गया हु ........ऐसा मुझे लगता है ......सुरभी हमारी क्लास में सेकंड आयी है वो भी हमेसा की तरह हंस  रही है ......छोटी मोटी नोक झोंक के बीच हमारे ज़ल्द ही हाफ इयरली  एक्साम भी निबट गए पता ही नहीं चला  दो दिन बाद रिजल्ट है .....में पास हो  जाऊँगा में रोज़ सुबह उठ कर गायत्री मंत्र का जाप कर अपने आप को तसली देता हु ........आज रिजल्ट आया है......पिताजी को में रिजल्ट देखने को बोलता हु ...खुद टीचर  की डांट के डर से बाहर ही खड़ा हु ....सुरभी  कौन है पिताजी पूछते है ......क्लासमेट  है में हलके से बोल देता हु ......वो फर्स्ट आयी  है अगली बार उस की तरह नम्बर लाना ....मुझे बड़ी हेरानी है अब प्रतीक का क्या होगा ......प्रतीक  ने मुझ से अब बात करना तकरीबन बंद कर दिया है ,वो अब किताबों में ज्यादा समय गुज़ारता  है ......उसको लगता है उसके किले में किसी ने सेंघ लगाई है......वो किसी  जंगली शैर की तरह किताबों का बड़ी ही बेहरहमी से शीकार करता है .....किसी  के हाथ में दीखती कोई नयी  refrence book ...को ...वो  उधार मांग लेता  था ......मेरे नाइन्थ स्टैण्डर्ड के चार मौसम कैसे गुज़र गए पता ही नहीं चला .....हमारे final  एक्साम होने वाले थे हम सब बड़ी जोर शोर से मेहनत पर लग गए .......सबने  अपना अपना बेस्ट दिया.......एक्साम ख़तम हुए  तो रेस्ट के लिए कुछ दिन की छुटियाँ      मिली ....इन छूटीयों में ......में  केवल भगवान् की पूजा करता रहा ......कुछ दिनों बाद रिजल्ट भी आ गया ......हमारे क्लास मे  फर्स्ट के नाम की घोषाडा हुई तो सबसे पहला नाम प्रतीक  का लिया गया आखिर उसका रोब लोट आया था .......सुरभी  एक बार फिर सेकंड आयी.....वो उस दिन भी मौजूद नहीं थी ...हम सब खुश थे पास होने से ज्यादा हमे गर्मीयों  की  छूटियों की परवा थी.......लम्बी गर्मीयों  की छूटियों के बाद हम सब लोटे सिवाय एक के ....


सलीम .....53 नम्बर  है क्या.........किसी  ने डॉक्टर के केबिन से  बड़े ही रूखे अंदाज़ में नाम पुकारा है.....में दुबारा सुरभी  को देखता हु ....वो कुछ बदली बदली  सी लगी है..उसका पूरा चेहरा तकरीबन सफ़ेद हो चूका है ........में उसके पास तक जाता हु.....उसने मेरी  और देखा ..वो मुझे एक दम  पहचान लेती है...तू यहाँ कैसे .....और क्या कर रहा है.....दोस्त के साथ आया हु में उसे कहता हु ....वो आज भी नहीं बदली....उसकी जीवटता  देखकर बड़ी हेरानी होती है.......में ना चाहते हुए भी नजाने  क्यूँ उससे    बैवकूफी भरा सवाल     पूछ लेता  हु ......यहाँ कैसे ...और ये क्या हुआ है तुम्हे .......वो थोड़ा हिचक जाती है .......leukoderma वो हलके से बोलती है.......


इस  बीमारी ने उसके चहेरे की चमक फीकी कर दी है ...पर उसके जीजीविशा  उसे  अभी भी एक आकर्षक व्यक्तित्वव देती हैं    ......."leukoderma" एक अनुवांसिक रोग है ऐसा मेने किसी  अखबार में पडा था....हमने स्कूल की  कुछ पुरानी बातें की ...जब  तक उसे अंदर से डॉक्टर ने नहीं बुलाया ......अच्छा में चलता हु में उससे कहता  हु.....वो फिर हंसती है और bye कहती है.......में अपने कानो पर अपने mobile के ear फ़ोन   लगाता हु.......हम सब अपने अपने मौसम का इंतजार करते हैं और मौसम यादों का हो तो उसके साथ खेलने  का मजा  ही कुछ और है.......में F M की आवाज़ को  बढ़ाते हुए  इन लाइन्स को रटने   की कोशिश में हु .....किसी  ने गाने के फरमाँश की है ......समवेदनाव के तार को झनझनाता  संगीत एक बार फिर मुझे  उसकी ओर  देखने को मजबूर करता है ..उसकी जीजीविशा  देख मेरे मन के अंधेरे कमरे में बुझा दिया एक बार फिर जल उठा है....आज पांच साल हो गए पर वो मुझे नहीं मिली  में डेल्ही में हु और मुझ जैसे कई  लोगो के दिल में ........जो maths  science  से इतर .ज़िन्दगी में हँसते रहने का एक नया लेससन पड़ा रही है. कही पड़ा था मेने ".


जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते….....उसकी वजह से मेरे ज़िन्दगी में नए सुबह आयी  है तो ......मेरे तरफ से good morning teacher ..






"फ़ोन की घंटी ने  मेरी  नींद को एक बार फिर तोडा  है...में घड़ी की और देखता हु ....9 बजे हैं......फ़ोन उठाता हु.....अबे कॉलेज नहीं आना क्या....गौरव का फ़ोन है ....मुझे अभी भी   नहीं लग रहा है की मेने सपना देखा है"




"कभी खोजीयेगा   उमीदों के  खोल.......
सिराने पड़े मिल जाएंगे आपको ...
बस पलक बंद करने की देर है"
                                                                                                                    
 "कुछ सच्चे पात्र और खयालों के धागे हैं ..मेंने अपने तानाशाही दिमाग से अपने विचारों को आजाद किया है...
"मगर कुछ सचची कहानी भी है  जो हमे हर वक़्त जीने की उम्मीद देती है ... सिखा नाम की वो  लडकी   जो ज़िन्दगी के मंच पर herione है  .....जो अपने  चेहरे और टांगो से विकलांग होते हुए भी ज़िन्दगी के मंच पर बखूबी नाच रही है .....वो  अपने छोटे भाई को खूब हंसाती  है  और नौकरी कर अपने माँ बाप का सहारा बनी हुई है ..........रावत जी की मिठाई की दूकान में काम करने वाला  12 साल का सुनील ...बर्तन धोते हुए भी पहाड़े याद करना नहीं भूलता ....है ना ये  ज़िन्दगी मज़ेदार

 

Monday, November 7, 2011

उलझन



मेने कल कुछ रिश्तो  के लछछे  बांधे थे खुटे पर........
अब देखू तो वो लछछे कुछ सुलझे हैं और कुछ उलझे .....

Tuesday, October 4, 2011

शर्म



कांच का बड़ा सा दरवाजा जब चौकीदार ने खोला और हाथ को अपने  माथे   पर रखते हुए कहा " सलाम मैम साहब ". मैम साहब सुन कर महिला के चेहरे  पर एक तीखी मुस्कान बिखर गयी .उसको अपनी अमीरी पर फक्र होने लगा ...रोबीला चेहरा लिए वो अपनी  ६ साल की बेटी को ले दुकान में दाखिल हुई .दुकान के चमचमाते सीसों से टकराते हुए उस ६ साल के लड़की की  नज़र दूर बाहर खडी एक लड़की पर पड़ी .......कमजोर चेहरा ,दुबली पतली कद काठी की  वो करीब १६ साल की  लड़की उन्हें लगातार घूरे जा रही थी. " माँ देखो न उस लड़की को कितने गंदे और फटे कपडे पहने हैं उसने ....अपनी माँ के हाथ को कई बार झटकते हुए . ६ साल की पिंकी ने उस लड़की की लाचारी से झाकते उसके बदन की ओर इशारा करते हुए कहा .........वो बेहद कमज़ोर थी ओरे हर वक़्त अपने कपडे पर लगे लाचारी के चीथडों को संभाल रही थी ...पिंकी की माँ नै अपने हाल्फ स्लीव ब्लाउस को थोडा व्यवस्थित करते हुए पिंकी को झीडकी लगाई ....वो तो बेशरम लड़की है ..शर्म तो बेचने के लिए होती है इनके पास ...वो मन ही मन बुदबुदाई ...."कौन सी  ड्रेस दिखाऊँ बच्ची के लिए" ...दूकानदार अपनी जगह को छोड़ते हुए अभिनन्दन की मुद्रा में आ गया ...फरोक दिखाऊ बच्ची के लिए बहुत प्यारी लगेगी ...दुकानदार ने बात को ज़ारी रखते हुए कहा .......पिंकी की माँ उचक  पड़ी.....अंग्रेजी में कुछ तीखे प्रहार दुकानदार पर दिए......आप कैसी बात करते हैं इस नए ज़माने में फरोक पहनेगी मेरी बेटी.....वो दीखाइये ऊँगली से एक मिनी स्किर्ट की ओर इशारा करते हुए वो बोली ......दुकानदार ने एक बार उस बच्ची की और देखा और एक झुकी नजरो से उस महिला की ओर ...और जोर से चिलाया छोटू......वो तीसरे माले पर रखी ड्रेस दिखाना ........ .उधर वो दुबली लड़की अभी भी अपने कपड़ो को खींचकर कुछ बड़ा करने की कोशिश कर रही है..........शायद कुछ लाज बच जाए...


"हर बार मेने अपनी शर्म की चादर को कई बार सिया है
  मगर इस कम्बक्त बादल   ने बहाने से मुझे बेसरमी की  बारिश में फिर भिगो दिया है "

Friday, August 12, 2011

आंसू बोलू या मोती

    आँख के आंसू मटमैले  होते 
    भूख आंत को छूती है
   बीते रात केवल बर्तन लुडके थे 
   कैसे बोलू क्या बीती  है

Monday, August 1, 2011

अधकचरा



मेने  पीछले हफ्ते ही कुछ ख्वाब   रोपे थे फलक पर  .........                                                                     
हर खवाब को सीचता हु उन बूंदों से जो जमा है एक अरसे से पलक पर .....

Saturday, April 16, 2011

कुछ इन्कलाबी .............

उस दिन भी सिस्टम को गलियाते हुए में घर से निकला....साला रोड बाद में बनती है खोद पहले देते हैं.....आपसी  coordination तो साला किसी  डिपार्टमेंट के पास नहीं...है...यूँ भी हम सिविल सोसाइटी वाले लोगो की आदत है....दिन महीनो  और सालो का गुस्सा ......किसी एक चीज़ पर  ठोक बजा के निकालते है......तो में भी यही कर रह था  खुदी पड़ी उस सड़क को अपने गुस्से से लतिया  रहा था .......अरी पागल है .......थोडा मंद बुद्धि है......सामने पीले suit  में फंसी नेगी आंटी अपनी तारकिक्क  समता का  परिचय   देते हुए शर्मा अंकल को कह रही थी  .........६ फूट लम्बे शर्मा जी जो अपनी व्यवहार कुसलता   और  वाक्पटुता के लिए कालोनी में  काफी चर्चित हंसती थे ......उनकी हर बात पर  हामी भरे जा रहे थे....अपनी बात को  समर्थन मिलता देख वो कुत्ते वाली ऑंटी(नेगी ऑंटी)....जो अक्सर बच्चो को यह कह कर डरा देती  है  .......की  अगर गेट  के  अंदर आये तो कुत्ता छोड़ दूंगी तुम्हारे उपर......खीसे निपोर कर  हंसी जा रही थी....सामने खड़ा एक खूबसूरत  डील डोल  वाला लड़का बिना किसी सरकार की मदद  लिए और किसी अधिकारी  का इंतज़ार किये......उस बेतरतीब  रोड को समतल कर रहा है......

भीड़ बड गयी है ....कुत्ते वाली ऑंटी के साथ अब कालोनी के कुछ और बातूनी और फिलहाल बेकार ...ओरते जुड़ गयी है.....रावत जी का लड़का कुछ करता नहीं बेरोजगार है.......नेगी ऑंटी बड़े गर्व से बोलती है....खुद का बेटा आर्मी में सिपाही है ......अब नौकरी लगना  भला आसन काम है  क्या ......B A , M . A, करने वाले खाली है  तो ये तो दसवी  पास   है  केवल......शर्मा  जी अपने  मीठे  अंदाज़ में बढ़ी ही कडवी बात कह जाते है.........वो गोरा लड़का  अभी भी सड़क को ठीक कर रहा है ...... लड़का अपने घर से होता हुआ काफ्फी घरो की सड़क को समतल कर चूका है.....

मेरे बेटे को ही लो...तीन तीन क्लिनिक पर बेठता है......आसान  है क्या.....शर्मा जी  की आवाज़ में एक अलग भारीपन है और थोडा गर्व भी ....शर्मा जी  का बेटा डॉक्टर है......आयुर्वेद का.....कभी पूछयेगा    की किसी अस्पताल में क्यूँ नहीं करते प्रकटिसे तो बड़े सलीके  से सम्घायेंगे .आपको शर्मा जी ...अब अपना  काम तो अपना ही होता है...क्यूँ . ये उनका पेट जुमला है......पिछले तीन साल में उनका बेटा  सेकड़ो अस्पतालों के लिए सोर  सिफ्फरिश   दे चूका है......पर शर्मा जी को छोड़ कर ये बात सारा मोहल्ला   जानता  है.......उन्हें तो बस एस बात पर फक्र है की बेटा डॉक्टर है.....लोगो से कम  मिलता है शर्मा जी का बेटा  ताकि साख बनी रहे मोहल ले  में .......और जिस से  मिलता है उसके सामने पांच साल की सीखी   डॉक्टरी .......पांच मिनट में बघार जाते है........"मेरे   मास्टर हर वक़्त एक बात कहा करते थे  .....ज्यादा पढ़े लिखे लोग अक्सर ज्यादा बोलते है......और कम पढ़े लिखे केवल काम करते हैं.......

 सड़क समतल हो चुकी है ......और वो बुधी जीवी  भवरे  (auntiyaan ) अभी भी मंडरा  रहे है.....उस गोरे लड़के के चेहरे पर शार्मिन्दागी की अलग अलग आक्रीतियाँ  उभर आयी  हैं ....शायाद कान में कुछ सब्द पड गए हैं उस लड़के के उस बुद्धीजीवे तबके के द्वारा  ....बात उसके  ही  बारे में हो रही है ये उसे अहसास हो चूका है ......"हम कैसे भी हो और किस भी सामजिक और आर्थिक परिवेश से तालुक रखते हो ...मगर हर आदमी के अंदर एक आत्म समान की  चादर होती है .......जिसे वो फटने नहीं देना चाहता ...... "वो गोरा लड़का अपने पसीने के बूंद को उंगली यो      में समेटते हुए ......सूरज की  ओर एक बार निहारता है......फावड़ा उठता है .....और अपने आप को सान्तवना देता.....अपने दो कमरों वाले घर में घुश जाता है.....
नेगी ऑंटी अपने भारी भरकम सरीर को अपने घर  की  ओर घुमाती  है और अपनी व्यस्तता गिनाते हुए  वहा  से सरक लेती  है..... शर्मा जी का लड़का कुछ गुन्नाते हुआ वहां अपनी bike में पहुँचता है ........खडी  ओरते  अब ज्यादा वयवहार कुशल होते हुए ......डॉक्टर साहब आप कैसे    है का जाप सुरु कर देती है......डॉक्टर साहब को अपनी डॉक्टरी की  डिग्री पर उस वक़्त फक्र होने लगता है.......डॉक्टर साहब हँसते हैं .......डॉक्टर साहब की  उम्र तीस साल है .... सायद उस गोरे लड़के के बराबर ......
कमाल है सड़क काफी समतल कर दी  है.....भाई दाद देने पड़ेगी  उसकी जिसने ये किया....डोक्टर  साहब फुस्फुस्साते हुएनिकल लिए....शर्मा जी अपने बेटे के ओर देखते है.......जैसे अभी तक चली  टांग खीचाये  में वो अपनी बात को फिर टटोलने की कोशिश कर रहे हैं  ......ओरतो   की   हंसी रुक गयी  है.....वो कुछ गंभीर मुद्रा में है....जैसे   दिल में अटकी असली बात को    डॉक्टर साहब ने एक झटके में बोल दिया .....भीड़ तितर  बितर हो गयी है  मेने एक बार फिर सड़क को देखा और........कहा साबास हीरो......किसी घर से गाने की  आवाज़ आ रही है.......तोड़ेगे दिवार हम ...पायेंगे हम रास्ता.....यार हाँ.......मेने भी मन ही मन   कहा ...हाँ यार तुम जैसे  लोग रहे तो जरूर पायेंगे....