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Wednesday, May 16, 2012

खाली कैनवस .........









उस रोज़ गर्मी अपने चरम पर थी ...सूरज  धरती को निगल  जाने की फिराक में बैठा  था ....दूर  कही मरीचिका से ज़िन्दगी के कैनवस पर    बनते बिगडते कुछ स्याह  सफ़ेद चित्र   हैं   ..   धुल के  गुबार आसमान  से दुश्मनी पाल बेठे हैं   ...आसमान  अब मटमैला सा है .......फूल और पत्तीयों   ने हवाओं के खिलाफ  के जाके चुप्पी   साध ली  है ...मुआ कल का खरीदा हुआ जूता मुझे  कई  बार न्यू पिंच की चूटियाँ   काट चूका है .....इतना  की पैर में अब पानी से भरे फफोले हैं ......

     ...संगम विहार की  तंग गलियाँ   चकर घिन्नी  की तरह दिमाग में कही फिट ही नहीं होती ....इतनी अँधेरी की बस काले नाग सी    डसने को तैयार   ...पेसाब की  तेज़ गंध और खुलीं   नालियों में रेंगते   वो लिसलिसाते    कीड़े.....उनको देख अक्सर बेवक्त आये राहगीर के  मुह में गश्याला सा पानी जमा होने  लगता है ..,,,,गली सकरी है तो सरीफो  को घुटन  होती है पर मौका  परस्तों के लिए गली . एक मौका  है....... सुनेहरा मौका, किसी  राह चलती की चींखो को कैद कर देने का    ...


फोटो स्टेट की एक गर्द गुबार भरी  दूकान में टकटकी साधे वो बड़े डील डॉल  वाले बेरोजगार लड़के हैं ..जिनकी  निगाह  बस राह गुजरती लड़की के शरीर के चीथडे  उड़ा देना चाहती  है ......वहां चलती हर लड़की एक अलग सा.protective  कवर लिए चलती है  .....नज़रे झुकाए  रखने का ......गिद्दो से नज़रे मिलना अच्छा नहीं मानते ऐसा वहाँ की लड़कियों  ने पड़ा है......... वो इतनी .protective होती हैं की अपनी निर्वस्त्र हथेलियों  को देख  शर्म से अंदर गड़े जा रही हैं .....दुप्पटे से अपनी   खुली हथेलियों को छुपाने का निरंतर कोशिश में  हैं ....की उन घूरती निगाहों से पार पा सके ....... प्रयास ज़ारी  है ....    


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वहीँ संगम विहार की एक गली में सोनू अपना  रेडा    लगता है ......उसने उन सकरी गलियोँ में इक मुफीद   जगह तलाश ली है  ....   कुछ हफ्तों पहले ही उसने  अपनी गोला बेचने की दूकान खोली है...... सुबह  से श्याम तक ,जब तक की संगम विहार की  स्याह श्यामें काली नहीं हो जाती तब तक वो वहां से नहीं हिलता ...... हालाकी कमाई  के नाम पर सोनू के पास....कुछ खास नहीं है ....ग्रहाक ज्यादा नहीं आते पर महीने का 2500 तक कमा लेता है ........पुलिस वालों के हाथ से  कुछ बच पाया तो वो अलग...सोनू को   तकरीबन एक साल हो गया दिल्ली  आये हुए  .... घर में तीन बड़ी बहने हैं ..पिताजी की हैजा से मौत  हुई तो सोनू ने घर की जिमेदारी संभाल ली .....एक साल पहले जब दिल्ली आने   का  फैसला किया  तो माँ ने सब    पूंजी जोड़ कर सोनू के हाथ में रख  दिए .......रोते हुए  माँ को बोला था "माँ तू चिंता मत करना "...बस उसके बाद सीधा चला आया ।दिल्ली ,कुछ महीने तक तो सब   ठीक चला   पर जब घर से लाये पैसे  खत्म होने को आये तो वहीँ किसी  दूकान पर बर्तन धोने का  काम पकड़ लिया  ....धीरे धीरे दूकान वाले से सोनू की अच्छी बन पड़ी तो  उसी ने कहीं जुगत लगा उसको रेडा  दिलवा दिया  ...

जिसमे वो सतरंगी बर्फ के गोले बेचता है   ..हालाकि उसको  खुद की ज़िन्दगी कभी भी सतरंगी नहीं लगती ...जब से सोनू दिल्ली आया  लगातार गिर सा  रहा है। मन से और तन से भी ....ठीक से ना कभी खाना हो पाया न .....सोना ..वो इतना कमज़ोर हो चला है  की छाती की पसलियाँ एक बालिश बहार    आ गयी   हैं।...तीन कमीज़ जो वो गाँव से लेकर चला था अब बस कुछ ही दिन और उसके शरीर पर   चस्पा होंगी .....अब तक  कमाए पैसों का   ज्यादा तर हिस्सा वो घर बेझ  दिया करता था ...अपने ऊपर सोनू का खर्चा  ना के बराबर था ...   पर आज उसका ज़नम्दीन .... है उसने आज अपना खुद का ज़न्म्दीन  मनाने  का फैसला किया... अब तक बचाये अपनी सारी  जामा पूंजी का हिसाब लगाया..अपने कमीज़ के  खानों को  टटोलने के बाद कुल पैसे उसके पास थे 30 रूपए ..जो वो  सब  खर्चा होने के बाद बचा पाया था ....वहीँ गली में ख डी एक कार में बेठे बच्चे  के हाथ में paistrees   देख  कर उसने भी खाने का मन बना लिया ..वो उस चीज़ का नाम नहीं  जानता था ....पर उसने  पास  वाली  दूकान में वो चीज़ देखी थी .....उस ..शाम उसने अपनी सा री    हिम्मत को सकेरा    और दूकान के पास पहुंचा  ......

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उस रोज़ अनुपमा का भी संगम विहार आना हुआ ... उन सँकरी  अँधेरी गलियों को देख   वो  घबरा सी गयी  थी ..उसने कभी कोठा नहीं .देखा था ..पर   यहाँ दिखता वही  माहोल उसके    अंदर एक अलग सी छवि उकेर रहे थे .......... जोर जोर से आती  आवाजें ..वहीँ दूकान मे खड़े वो बिगडैल छोकरे  , जो हर वक़्त  एक घीनोनी   हंसी छोड़ रहे हैं ....जो शायद किसी    भी लड़की  को पसंद ना आये  .........हर वक़्त .गलियों  से   निकलते वो   अद्रिसिये हाथ.... वो  निगाहें जो किसी भी नवयुवती की महक को दबोच लेना चाहती  हैं  ...उन मलीच हाथो के निशान जो  धुलने  के बाद भी किसी  की  आत्मा से   नहीं मिटते .....एक डर   उसके दिमाग में कहीं  घर सा कर गया है। इस जगह   को देख कर अनुपमा बहुत सहमी  हुई सी है ....उपर की छ त  पर एक महीन परदे से झांकती कुछ लडकियां हैं ।......उसका जेहन हिल सा गया है .... हालाकि यहाँ कोई कोठा नहीं है .....पर माहोल डरा देने वाला है ...दूकान  पर खड़े   उन लडको की गिद्ध जैसी  निगाह अनुपमा के  शरीर का सारा मुआयना कर चुकी  हैं ... वो जैसे उनके जेहन को भांप सी   गयी थी        
       लडको    की फब्तियां अब लगातार बढ़ती जा रही हैं, उसने पुरे जोर से अपने पैरो को  बढ़ाया ।..और एक हाथ  से अपने दुपपट्टे     पर लगी पिन को निकाल लिया ..उसके पास  अपने   आप  को बचाने के किये केवल ये    पिन ही  था ....वो   आचानक  लड़ खड़ा    कर गिर  पड़ी .....       गिरने से पैरो   का  एक   तरफ  मांस का हिस्सा निकल    गया । काफी   खून बह रहा था......उसके हाथ से  पिन  छुट गयी थी ....इस   से पहले की    दिमाग में  और कोई उथल पुथल होती और वो  फट  जाता...सोनू  वहां  आया, और बड़े सलीके से बोला .....मैडम आपको लगी तो  नहीं ..   .. ..पर अनुपमा . ने उसको  झूट बोल दिया.... नहीं। सोनू ने उसको उठाने का प्रयास किया   ...  अब    तक वहां   पर वो   छोकरे भी ज़मघट  लगा चुके थे ........ उन्ही  में से एक ने अपना  हाथ ब ढ़ा ....मदद की पेशकश  की .......पर पेशकश केवल बहाना भर था ...   उसका मकसद अपने मलीच हाथो को उसके शरीर तक पहुँचाना था .....अनुपमा . ने झट से मना     कर दिया ...
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सोनू ऑटो ..लेकर आ गया।.....अनुपमा    संगम विहार     से काफी दूर  रहती  थी  यहाँ अपनी  दोस्त से मिलने आयी  थी .......वो बस से आयी  थी उसके पास ऑटो   के लिए पैसे नहीं थे ......उसने ऑटो वाले को मना   किया ..और खड़े   होने लगी ....पर गिर गयी।.....सोनू ने उसे सहारा दिया।. ..उन लडको में से एक लड़के ने फिर उससे छूने   की कोशिश की...उसने  उसका हाथ झट से झटक   दिया ....अनुपमा अभी भी पैसों की चिंता में  थी .......मैडम  कहा   जाना है  आपको सोनू ने ......प्रशन किया....... "लक्ष्मीनगर ," अनुपमा बोली  .......भाई लक्ष्मीनगर छोड़ देना मैडम को ........सोनू को थोडा सभ्य जान उसने अपने  दुविधा सोनू  के सामने रखी ...पैसे नहीं हैं  मेरे ..पास  केवल 100 ....रुपई हैं।......भाई कितना लगेगा लक्ष्मीनगर का ..सोनू ने प्रसन  किया  ...120 ....और  कम  कुछ  नहीं करूँगा फिक्स रेट है ..ऑटो वाले की आवाज़  में तल्खी   थी ........सोनू ने अपनी जेब पर नज़र फिराई .......तय किया की ये पैसे उस लड़की को दे दू  ... पर फिर रुक गया  .....उसने मना  करने का मन बना लिया ........भाई साहब थोडा ठीक लगाओ ......सोनू ऑटो वाले को बोला .....फिक्स रेट है ....वो नहीं माना ......सोनू ने  एक बार फिर अनुपमा की तरफ देखा ...और फिर उसके घाव को ......उसने जल्दी से 20 रुपये निकाल कर .अनुपमा की हाथ में रख दिया।.....

ऑटो  निकल गया.......  भीड़  तितर बितर हो गयी ...और सोनू का बहुत दिनों के बाद  बहार खाने का सपना भी ......सोनू की जेब में केवल अब दस रुपये हैं .......उसने पेस्ट्री खाने का विचार त्याग  दिया ...... उन दिनों पेस्ट्री  10 रूपए की आ जाया करती थी ....पर  अब सोनू हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था...  उसे डर  था की दूकान दार उससे धुत्कार देगा ।...उसने  महेंगे  कपडे भी तो  नहीं पहने थे...जो की दूकान दार उसे  प्यार से उस चीज़ के बारे में बताये   जैसा की वो..अमीर  बच्चो  के  साथ करता था .....आज उसका ज़नाम्दीन था और वो आज न किसे पुलिस वाले की ..और ना किसी  और की डाट  खाना .चाहता था।आज उसका दिन था .......उसने तय किया की वो दूकान  में जाएगा ....वो हँसता हुआ  दूकान में गया और दो पाव   खरीद लिए ....एक उसने वहीँ गली में बेठे कुत्ते को दिया ...और ..एक खुद .. खाया ......उसकी आँख में आंसू थे।  कुत्ते ने थोडा करीब आकर सोनू  की पाँव को  स्नेह से चाटा ..........रात .. हो चली थी........कहीं दूर मधुर मय संगीत है ........ ज़िन्दगी का  collarge    कहीं टूटी हुए   चित्रों को जोड़ कर कहानी गड़ना चाहता है .........

Saturday, May 5, 2012

बात बने

  हाथ में थामे पत्थर जो तोड़ता सीश महल को
बोल देता है हर कोई ,पागल  मेरी उस पहल को

 हाथ ज़ख़्मी है ,या वो पत्थर  हुआ  ज़ख़्मी
रो पड़ा पत्थर ,जब तलक देखा खून से  सने  सहर को

टूटती है आस जब ,मंदिर और मस्जिदों में
तब  हैं  अर्ज़ियाँ  सेकड़ो ,उस गाँव   वाली  नहर को

इन्कलाब की बात अब छोड़िये   ज़नाब ,,,
रोटी मिले तो बात करे आज इस  पहर को

जो  मिटा दै आंसू ये कविता हर एक   आँख के
तो कोई बात बने , की तुमने काट दिया ज़हर को 



डायरी



वो   जनवरी  की   सबसे सर्द श्याम  रही होगी ...   कहीं किसी बंद  केबिन  में  डॉक्टर ने अपने सफ़ेद कोट को पहन कर , मंत्री जी के हाथ में  सिफारिशी पैकेट  रख  अपने ट्रान्सफर की दरखुवास्त है.....
गाँव के किसी 10×12 साइज़ के छोटे से अस्पताल में नए डॉक्टर की गैर मोजुदगी से रमेश बाबु की अस्थमा से असमय मोत  हो गयी  है .......रमेश बाबू  गाँव में एक    मेहनती शिख्सक   थे ....गाँव में सूरज ढला है ....... सहर  में सूरज  उससे भी पहले ढल गया है ...शाम के  पांच बजे हैं ...केबिन से निकलते  ही डॉक्टर   के चेहरे  पर मुस्कान  बिखर आयी  है....डॉक्टर  का ट्रान्सफर रोक दिया गया है ..उपर . वाले के दरबार में  इंसानियत   को  फिर कुछ हफ्तों   के लिए मुल्तवी किया गया है ............डॉक्टर साहब पुरे हॉस्पिटल को कार्ड बाँट रहे हैं। आज घर में मूर्ती स्थापना का आयोजन है ....... उनका पूरा थैला बड़े ही सजीले कार्डों से भरा है ....

रमेश बाबु की  पत्नी ने घर में रखी  सारी बैडोल सी मूर्तियों   को गुस्से में तोड़ दिया है ..............गाँव में अब  अँधेरा है ......रमेश बाबू का  दू ध मुहा बच्चा ज़मीन  से माटी चाट रहा है ...गाँव के  उस छोटे  से अस्पताल के रजिसटर् में चडे    रमेश बाबू का नाम अब गहरी नीली स्याही से काट दिया गया है।......सब . तरफ अब बस लम्बा इंतज़ार है अगली सुबह का...और एक और रमेश और एक और  अनाम  .डॉक्टर का ......गाँव में केवल दो ही बस जाती हैं .........

"यूँ अगर पत्थरों में  बसने लगता भगवान् 
तो लोग न कोसते उन गुनाहगार चट्टानों को 
उन टूटे  मकानों को , जो यूँ ही ले गए सेकड़ो जानो को 


"

Monday, April 23, 2012

बड़ा भिखारी



हाथ डाल जेब में सिकका   टटोलता हु मै
है फटी जैबे मेरी एक अरसे से 
हाथ फैलाए  भिखारी को एक इज्ज़त का झूठ बोलता हु में 

क्यूँ रोऊँ में तेरे हालात पर 
हालात तो मेरे तेरे ही जैसे  हैं 
मेरे पतलून के जैबे फटी हुई 
और तेरे फटे कुरते में पैसे हैं 

कंगालियत से यूँ मुझे न देखा कर 
मुफलिसी के दिन है बेटा ,हम भिखारी तेरे ही जैसे हैं

 

Thursday, April 12, 2012

बावरी कोशिश



ज़िन्दगी है  देखो एक बड़ा सा धोखा
कल मिला था पुआ , आज खड़ा हु भूखा
आँख में है देखो ,दोड़ता समंदर
हाल कोई जाने तूफ़ान का ., जो छोड़ आया एक भयानक मंज़र
आ फिर कोशिश कर तोड़ देते हैं एक खंज़र 
 
 
 

Sunday, March 4, 2012

कोहरा






 रात के साडे तीन बजे थे ..बस ने आचानक मारे ब्रेक से मेरी नींद को बड़े ही गैर जीमे दारं अंदाज़ में तोडा है....

.३.३० बजे बस अड्डे में सभी passengers  ने अपनी आँखों को मलते हुए ये बात कही थी .." पहुँच गए क्या "...पीछे बेठे किसी साथी passenger ने अपने रात भर जगे होने का परिचय देने के लिए  बड़े  ही भारी अंदाज़  में कहा था 'हाँ जी पहुँच गए"सभी लोग अपने झोले खाकड़ उठाये और बस से एकएक कर उतरने या उतारे जाने लगे .......में भी होलिया अपने रास्ते ....सबसे पहले ठंडी होती उन्ग्लीयूं ने मेरे जैकेट में पड़े गरम फ़ोन को ढूंडा .....हेल्लो हाँ में पहुँच गया हु" लेने आ जाना' ....मेने घर में फ़ोन मिला ये एकताला कर दी ......मोसम बहुत सर्द था और जूते के अंदर घुसती हवा  मेरे पेरों को लगातार चलने को मजबूर कर रही थी......हौले हौले   तकरीबन पूरा बस अड्डा खाली हो लिया था ......नजाने कितना टाइम लगेगा नवाब साहब को  पहुँचने में .... खड़े खड़े हम तो  यहाँ कुल्फी हुए जा रहे है  ........ मेने भाई को मन में ही थोडा झिडकी लगाई है

पैर चहलकदमी करना सुरु हो गए ..और धीरे धीरे में बस  अड्डे से बहार हो लिया .. .....वो पूरी सड़क में बिखरी सुनहरे रंग की पीली रौशनी .......दूर कहीं दिखती आम के ठूंठ पर पड़ी गांठे ........कोहरे में लिपटी हर इमारत ने ...मुझे  कभी डराया तो कभी बड़ा अच्छा सा महसूस कराया .............मेरे चलने का क्रम अभी अभी भी ज़ारी है ...बस अड्डा  अब धुंध में कहीं खो सा गया है......जैसे कभी वहां  था ही नहीं......
अकेले सुनसान सर्द रातों में वो लम्बे होते रास्ते बड़ा देहसत का अहसास कराते हैं .....बस पोल लाइट तय हैं जो की मेरे साथ अब तक चल रही हैं .....जो जरा ढा डस बंधा देती  हैं ........वो भी  अकेले खडी हैं बिना किसी  के इंतज़ार के .......कोहरा मेरा  लगातार पीछा कर रहा  है ...  सर पर रखा गरम  टोपा मुझे  नजाने क्यूँ माँ के गरम हाथो सा लगता है ....हठ ये प्रेत आत्मा कुछ नहीं होती मेरे  अपने ही  तर्क  जैसे डर के समुंदर में अंदर   गोता लगाते हुए खुद ही दम छोड़ रहे हैं .......मेरे पैरों की गती तेज़ हो गयी  है ...अक्सर लाइट चले जाने पर अँधेरे में ....मेरे पिताजी की सुनायी किसी  बहादुर बच्चे की  कहानी .....जिसमे में कहीं नहीं हु पर फिर भी खुद को वो बाहदुर बच्चा मानता हु याद आयी है... ....में अपने पैरों को सड़क पर बड़े सलीके से रखता हु ...मेरे हाथ मेरे जेबों में गैर इरादतन कई बार अंदर बहार हो चुके हैं ........फ़ोन को में silent  मोड में डालता हु.....ताकि रात में पसरे सन्नाटे की नींद न टूटे ...वो धीमी पीली रौशनी में जलती स्ट्रीट लाइट के नीचे  दिन भर से थकी एक पागल ......फटे बीछोने पर लेटी है ......जैसे अपना किरदार सीदत  से निभा के सोयी हो ....उसकी टाँगे ठण्ड से सिकुड़ कर उसकी छाती में गड़ जाना चाहती हैं .....,मेरे कदमो ने  उस पागल को देख और गति पकड़ ली है .......में उसे जल्द से जल्द पीछे छोड़ देना चाहता हु .वो पागल अब पीछे है में एक लम्बी सांस लेता हु ......मेने पीछे मुड़कर उस को  एक बार फिर देखा है ...वो पगली बड़ी जोर से हिली है ...मेरे दिल ने बहुत नीचे तक गोता खाया है और सर दूगुना भारी हो गया है ...जैसे किसी ने सांस रोकी हो ........ऐसा लगा वो पगली अपनी किसी  पुरानी याद से झगड़ रही है .....मेने  घडी की और  देखा है ......घडी की सुई अभी चार पर जाने को दस कदम दूर हैं ....कहीं दूर कुत्तो का भौकना जारी है ...


वो पगली दौड़ कर चिल्लाते हुए मेरे सामने आती है ...'सुन मेरे काहानी ...सुन ' ....मेरे आँखों में अजीब सी जलन और भयंकर गर्मी सवार हो गयी है  ...डर सरक के मेरे सामने आ गया ....मेने कश के अपनी दोनों आँखों को भींचा है ...आँखे धीमे से खोलता हु ......मुझे दूर  जलती स्ट्रीट लाइट पर मुडती मोड़ दिखाई देती है ...पीछे मुड कर देखता हु पगली अपनी जगह पर बेसुद लेटी है ...उसकी खराटे हवा में शोर मचा रहे हैं ...मेरे अंदर के डर ने जैसे हल्की  सी  नींद की झपकी ली है ....मुझे अब हल्का सा लग रहा है ...आँख से ठन्डे आंसू पिघल कर निकले हैं ...में अपने घर की गली में हु .....दूर से मेरे और आता एक couple  है ...कान में दोनों के एअर फ़ोन  चड़ा है ...हाफ्ते हुए अंग्रेज़ी में बतिया रहे हैं .....मेरा डर अब पूरी नींद ले चूका है  ......मेने फ़ोन पर टाइम देखा है 4.१५ बजे हैं ..में मुडके एक बार फिर उस सड़क को देखता हु ...वो पगली दूर तक कहीं नहीं दीखती ..मेरे पसीने से भीगी   मुठ ठी  अब खुल चुकी है ..........सामने मुझे मेरा घर दिख रहा है .........सर दिमागी उहा पटक से काफी थका हु आ है....
."किसने सुनी होगी उस पगली की कहानी .........मेने तो नहीं सुनी ......वो  सड़क में दौडते हुए couple  ने सुनी होगी क्या....सुबह की पहली किरण के साथ ही कहा जाती होगी वो  ...किसी दफ्तर या किसी   बड़ी गाडी की पीछे दौड़ती होगी क्या " ....नजाने क्यूँ अजीब से उठ्पटांग मगर वाजिब सवाल दिमाग में हल्की सी हंसी हंस रहे हैं .....


                                      "किसी की चोट गहरी है 
                             किसी का दर्द गहरा है 
                              किसी की चीख गूंगी है 
                              कोई कानो से बहरा है "