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Saturday, May 5, 2012

डायरी



वो   जनवरी  की   सबसे सर्द श्याम  रही होगी ...   कहीं किसी बंद  केबिन  में  डॉक्टर ने अपने सफ़ेद कोट को पहन कर , मंत्री जी के हाथ में  सिफारिशी पैकेट  रख  अपने ट्रान्सफर की दरखुवास्त है.....
गाँव के किसी 10×12 साइज़ के छोटे से अस्पताल में नए डॉक्टर की गैर मोजुदगी से रमेश बाबु की अस्थमा से असमय मोत  हो गयी  है .......रमेश बाबू  गाँव में एक    मेहनती शिख्सक   थे ....गाँव में सूरज ढला है ....... सहर  में सूरज  उससे भी पहले ढल गया है ...शाम के  पांच बजे हैं ...केबिन से निकलते  ही डॉक्टर   के चेहरे  पर मुस्कान  बिखर आयी  है....डॉक्टर  का ट्रान्सफर रोक दिया गया है ..उपर . वाले के दरबार में  इंसानियत   को  फिर कुछ हफ्तों   के लिए मुल्तवी किया गया है ............डॉक्टर साहब पुरे हॉस्पिटल को कार्ड बाँट रहे हैं। आज घर में मूर्ती स्थापना का आयोजन है ....... उनका पूरा थैला बड़े ही सजीले कार्डों से भरा है ....

रमेश बाबु की  पत्नी ने घर में रखी  सारी बैडोल सी मूर्तियों   को गुस्से में तोड़ दिया है ..............गाँव में अब  अँधेरा है ......रमेश बाबू का  दू ध मुहा बच्चा ज़मीन  से माटी चाट रहा है ...गाँव के  उस छोटे  से अस्पताल के रजिसटर् में चडे    रमेश बाबू का नाम अब गहरी नीली स्याही से काट दिया गया है।......सब . तरफ अब बस लम्बा इंतज़ार है अगली सुबह का...और एक और रमेश और एक और  अनाम  .डॉक्टर का ......गाँव में केवल दो ही बस जाती हैं .........

"यूँ अगर पत्थरों में  बसने लगता भगवान् 
तो लोग न कोसते उन गुनाहगार चट्टानों को 
उन टूटे  मकानों को , जो यूँ ही ले गए सेकड़ो जानो को 


"

Monday, April 23, 2012

बड़ा भिखारी



हाथ डाल जेब में सिकका   टटोलता हु मै
है फटी जैबे मेरी एक अरसे से 
हाथ फैलाए  भिखारी को एक इज्ज़त का झूठ बोलता हु में 

क्यूँ रोऊँ में तेरे हालात पर 
हालात तो मेरे तेरे ही जैसे  हैं 
मेरे पतलून के जैबे फटी हुई 
और तेरे फटे कुरते में पैसे हैं 

कंगालियत से यूँ मुझे न देखा कर 
मुफलिसी के दिन है बेटा ,हम भिखारी तेरे ही जैसे हैं

 

Thursday, April 12, 2012

बावरी कोशिश



ज़िन्दगी है  देखो एक बड़ा सा धोखा
कल मिला था पुआ , आज खड़ा हु भूखा
आँख में है देखो ,दोड़ता समंदर
हाल कोई जाने तूफ़ान का ., जो छोड़ आया एक भयानक मंज़र
आ फिर कोशिश कर तोड़ देते हैं एक खंज़र 
 
 
 

Sunday, March 4, 2012

कोहरा






 रात के साडे तीन बजे थे ..बस ने आचानक मारे ब्रेक से मेरी नींद को बड़े ही गैर जीमे दारं अंदाज़ में तोडा है....

.३.३० बजे बस अड्डे में सभी passengers  ने अपनी आँखों को मलते हुए ये बात कही थी .." पहुँच गए क्या "...पीछे बेठे किसी साथी passenger ने अपने रात भर जगे होने का परिचय देने के लिए  बड़े  ही भारी अंदाज़  में कहा था 'हाँ जी पहुँच गए"सभी लोग अपने झोले खाकड़ उठाये और बस से एकएक कर उतरने या उतारे जाने लगे .......में भी होलिया अपने रास्ते ....सबसे पहले ठंडी होती उन्ग्लीयूं ने मेरे जैकेट में पड़े गरम फ़ोन को ढूंडा .....हेल्लो हाँ में पहुँच गया हु" लेने आ जाना' ....मेने घर में फ़ोन मिला ये एकताला कर दी ......मोसम बहुत सर्द था और जूते के अंदर घुसती हवा  मेरे पेरों को लगातार चलने को मजबूर कर रही थी......हौले हौले   तकरीबन पूरा बस अड्डा खाली हो लिया था ......नजाने कितना टाइम लगेगा नवाब साहब को  पहुँचने में .... खड़े खड़े हम तो  यहाँ कुल्फी हुए जा रहे है  ........ मेने भाई को मन में ही थोडा झिडकी लगाई है

पैर चहलकदमी करना सुरु हो गए ..और धीरे धीरे में बस  अड्डे से बहार हो लिया .. .....वो पूरी सड़क में बिखरी सुनहरे रंग की पीली रौशनी .......दूर कहीं दिखती आम के ठूंठ पर पड़ी गांठे ........कोहरे में लिपटी हर इमारत ने ...मुझे  कभी डराया तो कभी बड़ा अच्छा सा महसूस कराया .............मेरे चलने का क्रम अभी अभी भी ज़ारी है ...बस अड्डा  अब धुंध में कहीं खो सा गया है......जैसे कभी वहां  था ही नहीं......
अकेले सुनसान सर्द रातों में वो लम्बे होते रास्ते बड़ा देहसत का अहसास कराते हैं .....बस पोल लाइट तय हैं जो की मेरे साथ अब तक चल रही हैं .....जो जरा ढा डस बंधा देती  हैं ........वो भी  अकेले खडी हैं बिना किसी  के इंतज़ार के .......कोहरा मेरा  लगातार पीछा कर रहा  है ...  सर पर रखा गरम  टोपा मुझे  नजाने क्यूँ माँ के गरम हाथो सा लगता है ....हठ ये प्रेत आत्मा कुछ नहीं होती मेरे  अपने ही  तर्क  जैसे डर के समुंदर में अंदर   गोता लगाते हुए खुद ही दम छोड़ रहे हैं .......मेरे पैरों की गती तेज़ हो गयी  है ...अक्सर लाइट चले जाने पर अँधेरे में ....मेरे पिताजी की सुनायी किसी  बहादुर बच्चे की  कहानी .....जिसमे में कहीं नहीं हु पर फिर भी खुद को वो बाहदुर बच्चा मानता हु याद आयी है... ....में अपने पैरों को सड़क पर बड़े सलीके से रखता हु ...मेरे हाथ मेरे जेबों में गैर इरादतन कई बार अंदर बहार हो चुके हैं ........फ़ोन को में silent  मोड में डालता हु.....ताकि रात में पसरे सन्नाटे की नींद न टूटे ...वो धीमी पीली रौशनी में जलती स्ट्रीट लाइट के नीचे  दिन भर से थकी एक पागल ......फटे बीछोने पर लेटी है ......जैसे अपना किरदार सीदत  से निभा के सोयी हो ....उसकी टाँगे ठण्ड से सिकुड़ कर उसकी छाती में गड़ जाना चाहती हैं .....,मेरे कदमो ने  उस पागल को देख और गति पकड़ ली है .......में उसे जल्द से जल्द पीछे छोड़ देना चाहता हु .वो पागल अब पीछे है में एक लम्बी सांस लेता हु ......मेने पीछे मुड़कर उस को  एक बार फिर देखा है ...वो पगली बड़ी जोर से हिली है ...मेरे दिल ने बहुत नीचे तक गोता खाया है और सर दूगुना भारी हो गया है ...जैसे किसी ने सांस रोकी हो ........ऐसा लगा वो पगली अपनी किसी  पुरानी याद से झगड़ रही है .....मेने  घडी की और  देखा है ......घडी की सुई अभी चार पर जाने को दस कदम दूर हैं ....कहीं दूर कुत्तो का भौकना जारी है ...


वो पगली दौड़ कर चिल्लाते हुए मेरे सामने आती है ...'सुन मेरे काहानी ...सुन ' ....मेरे आँखों में अजीब सी जलन और भयंकर गर्मी सवार हो गयी है  ...डर सरक के मेरे सामने आ गया ....मेने कश के अपनी दोनों आँखों को भींचा है ...आँखे धीमे से खोलता हु ......मुझे दूर  जलती स्ट्रीट लाइट पर मुडती मोड़ दिखाई देती है ...पीछे मुड कर देखता हु पगली अपनी जगह पर बेसुद लेटी है ...उसकी खराटे हवा में शोर मचा रहे हैं ...मेरे अंदर के डर ने जैसे हल्की  सी  नींद की झपकी ली है ....मुझे अब हल्का सा लग रहा है ...आँख से ठन्डे आंसू पिघल कर निकले हैं ...में अपने घर की गली में हु .....दूर से मेरे और आता एक couple  है ...कान में दोनों के एअर फ़ोन  चड़ा है ...हाफ्ते हुए अंग्रेज़ी में बतिया रहे हैं .....मेरा डर अब पूरी नींद ले चूका है  ......मेने फ़ोन पर टाइम देखा है 4.१५ बजे हैं ..में मुडके एक बार फिर उस सड़क को देखता हु ...वो पगली दूर तक कहीं नहीं दीखती ..मेरे पसीने से भीगी   मुठ ठी  अब खुल चुकी है ..........सामने मुझे मेरा घर दिख रहा है .........सर दिमागी उहा पटक से काफी थका हु आ है....
."किसने सुनी होगी उस पगली की कहानी .........मेने तो नहीं सुनी ......वो  सड़क में दौडते हुए couple  ने सुनी होगी क्या....सुबह की पहली किरण के साथ ही कहा जाती होगी वो  ...किसी दफ्तर या किसी   बड़ी गाडी की पीछे दौड़ती होगी क्या " ....नजाने क्यूँ अजीब से उठ्पटांग मगर वाजिब सवाल दिमाग में हल्की सी हंसी हंस रहे हैं .....


                                      "किसी की चोट गहरी है 
                             किसी का दर्द गहरा है 
                              किसी की चीख गूंगी है 
                              कोई कानो से बहरा है " 


Friday, February 24, 2012

पर्दा



व्यस्त सा ज़िन्दगी का कोना है ..
वो सीलन की भूताह छपी आकृतियाँ दीवार के अपने होने का आधिपतीय जताती हैं..


सुबह का आचानक से दिखा कोहरा अभी भी अपने अंदर ज़मी धुंद का प्रतिबिम्ब सा लगता है
सांस को चंद   मिनटों तक ज़हन में रोक लो तो
ज़िन्दगी अपनी कीमत का अहसास करा देती है
घर पर रखी वो आड़ी तीरची थालियाँ अब फ़र्स पर बेठ सीधे मुह बात तक नहीं करती
वो पुराने प्याले अब उन गरम हथलियों को तरसते हैं
बेफिजूल के कैलेंडर दीवार पर टंग जाने का एक गैर वाजिब ख़याल पाले हैं
वो खुली अटटेचियों के जंग खाए कोने
अब चमकीले रंग से सरमाते नहीं
सबसे पहली डायेरी   के छुटे कुछ पन्नो पर कलम नजाने क्यूँ गश खा कर गिर जाती है
उस पर लिखना एक अरसे से टाला गया है

चौखट पर टंगे परदे सी है ज़िन्दगी
दिमागी कमरों में चले जोड़ घटाने का इल्म तक नहीं होने देती



Sunday, February 5, 2012

वारदात


हर गमे चादर ,अपनी वारिश की सिनाक्थ करती है 
वो धुन्दलको में भी ,इन्साफ की बात करती है
तोड़ देते है जब हुक्मरान होसला इंसान का 
तब टूटती एक आश, बड़ी वारदात करती है

उन अफसरी दस्तावेजो   में .चीख़ों का हिसाब नहीं होता 
वो नुमाइंदे  रोते नहीं ,उन मांस के लोथड़ो को देख कर
क्यूंकि उनकी पोथीइयों का रंग लाल नहीं होता

खाली हैं बस्तियां ,    अब सन्नाटे रहते हैं खंडरों में 
ये बड़ी अच्छी बात है की अब कोई वारदात नहीं होती 
अब डरती हैं फिजायें यहाँ की ,इंसानों से
यहाँ अब इंसानों की बात नहीं होती   


(मरे हैं जो लोग दंगो में उनकी कोई न जात थी .......बेवक्त रोते हैं अंधेरों में अपनों के लिए वो आज भी)

Friday, January 6, 2012

कबाड़ से मिला कुछ कीमती सामान...




 सर्दी ने खुद अपने कसीदे पड़े हैं
लिफाफे में पडी कुछ रूठी और बेतरतीब बेठी यादें जिन्हें मेने तह कर के रखा था .... 
उस दवात में ज़मी वो गाढी अधूरी स्याह्ही
 उस रोज़ मेरे गुस्से का शीकार हुई कलम की निब
मेरे हाथो पर खरूंचे मार कर अपने होने का  अहसाह कराती वो मेज़ की  आवारा कीलें
वो बेसुद पड़ी क्रांती की  कुछ किताबे
झूट फरेब से टकराने को मेरे वो   कुछ अल्हड मिजजाज़ी ख़याल
मेरे मासूम खयालों का  चालाकी का  वो जादूगरी   चोगा
गुम होता कोई मेरे याद का  ज़रूरी दस्तावेज़
कई ज़ेबों वाली   वो मेरे जे कट   में खोई मेरे किसी नए नन्हे पेन की याद
 दू धिया रोशिनी वाला सुनसान खाली  पेन का होल्डर ,
जो बड़ा बवंडर लिए फिरता था नए लाल , नीली कलमों का
उसकी चुपी ,ओर
  मेरी हाल्फ   आस्तीनों की शर्ट का  झगडा आज भी मेरे पुरानी बाजुबंदू के साथ
घर में बीछायी  पुरानी पायदानों का झुक चुका कन्धा ,,
हरी भरी याद की सूख चुकी   झाडियों में मिला मेरा पुराना क्रिकेट बाल  
खिडकियों   पर  ज़मी  वो पुरानी  आवारा धुल
खुद से छुपाया मेरा कोई राज़  
उस रोज़ की आख़री शाम में अपनी ही याद के छुटे किसी धागे से खुद ही उलहज जाता सूरज 
ये सब बाट जो रहे थे किसी कलम की और एक यादो के किसी  उजले कागज़  की
पुराने साल के  कई धुल  भरे पैरों ने जैसे अपने सभी निसानो को खुद  ही साफ़ किया है

सायद नया साल आया है मेरे बागीचे में