Total Pageviews

Sunday, March 4, 2012

कोहरा






 रात के साडे तीन बजे थे ..बस ने आचानक मारे ब्रेक से मेरी नींद को बड़े ही गैर जीमे दारं अंदाज़ में तोडा है....

.३.३० बजे बस अड्डे में सभी passengers  ने अपनी आँखों को मलते हुए ये बात कही थी .." पहुँच गए क्या "...पीछे बेठे किसी साथी passenger ने अपने रात भर जगे होने का परिचय देने के लिए  बड़े  ही भारी अंदाज़  में कहा था 'हाँ जी पहुँच गए"सभी लोग अपने झोले खाकड़ उठाये और बस से एकएक कर उतरने या उतारे जाने लगे .......में भी होलिया अपने रास्ते ....सबसे पहले ठंडी होती उन्ग्लीयूं ने मेरे जैकेट में पड़े गरम फ़ोन को ढूंडा .....हेल्लो हाँ में पहुँच गया हु" लेने आ जाना' ....मेने घर में फ़ोन मिला ये एकताला कर दी ......मोसम बहुत सर्द था और जूते के अंदर घुसती हवा  मेरे पेरों को लगातार चलने को मजबूर कर रही थी......हौले हौले   तकरीबन पूरा बस अड्डा खाली हो लिया था ......नजाने कितना टाइम लगेगा नवाब साहब को  पहुँचने में .... खड़े खड़े हम तो  यहाँ कुल्फी हुए जा रहे है  ........ मेने भाई को मन में ही थोडा झिडकी लगाई है

पैर चहलकदमी करना सुरु हो गए ..और धीरे धीरे में बस  अड्डे से बहार हो लिया .. .....वो पूरी सड़क में बिखरी सुनहरे रंग की पीली रौशनी .......दूर कहीं दिखती आम के ठूंठ पर पड़ी गांठे ........कोहरे में लिपटी हर इमारत ने ...मुझे  कभी डराया तो कभी बड़ा अच्छा सा महसूस कराया .............मेरे चलने का क्रम अभी अभी भी ज़ारी है ...बस अड्डा  अब धुंध में कहीं खो सा गया है......जैसे कभी वहां  था ही नहीं......
अकेले सुनसान सर्द रातों में वो लम्बे होते रास्ते बड़ा देहसत का अहसास कराते हैं .....बस पोल लाइट तय हैं जो की मेरे साथ अब तक चल रही हैं .....जो जरा ढा डस बंधा देती  हैं ........वो भी  अकेले खडी हैं बिना किसी  के इंतज़ार के .......कोहरा मेरा  लगातार पीछा कर रहा  है ...  सर पर रखा गरम  टोपा मुझे  नजाने क्यूँ माँ के गरम हाथो सा लगता है ....हठ ये प्रेत आत्मा कुछ नहीं होती मेरे  अपने ही  तर्क  जैसे डर के समुंदर में अंदर   गोता लगाते हुए खुद ही दम छोड़ रहे हैं .......मेरे पैरों की गती तेज़ हो गयी  है ...अक्सर लाइट चले जाने पर अँधेरे में ....मेरे पिताजी की सुनायी किसी  बहादुर बच्चे की  कहानी .....जिसमे में कहीं नहीं हु पर फिर भी खुद को वो बाहदुर बच्चा मानता हु याद आयी है... ....में अपने पैरों को सड़क पर बड़े सलीके से रखता हु ...मेरे हाथ मेरे जेबों में गैर इरादतन कई बार अंदर बहार हो चुके हैं ........फ़ोन को में silent  मोड में डालता हु.....ताकि रात में पसरे सन्नाटे की नींद न टूटे ...वो धीमी पीली रौशनी में जलती स्ट्रीट लाइट के नीचे  दिन भर से थकी एक पागल ......फटे बीछोने पर लेटी है ......जैसे अपना किरदार सीदत  से निभा के सोयी हो ....उसकी टाँगे ठण्ड से सिकुड़ कर उसकी छाती में गड़ जाना चाहती हैं .....,मेरे कदमो ने  उस पागल को देख और गति पकड़ ली है .......में उसे जल्द से जल्द पीछे छोड़ देना चाहता हु .वो पागल अब पीछे है में एक लम्बी सांस लेता हु ......मेने पीछे मुड़कर उस को  एक बार फिर देखा है ...वो पगली बड़ी जोर से हिली है ...मेरे दिल ने बहुत नीचे तक गोता खाया है और सर दूगुना भारी हो गया है ...जैसे किसी ने सांस रोकी हो ........ऐसा लगा वो पगली अपनी किसी  पुरानी याद से झगड़ रही है .....मेने  घडी की और  देखा है ......घडी की सुई अभी चार पर जाने को दस कदम दूर हैं ....कहीं दूर कुत्तो का भौकना जारी है ...


वो पगली दौड़ कर चिल्लाते हुए मेरे सामने आती है ...'सुन मेरे काहानी ...सुन ' ....मेरे आँखों में अजीब सी जलन और भयंकर गर्मी सवार हो गयी है  ...डर सरक के मेरे सामने आ गया ....मेने कश के अपनी दोनों आँखों को भींचा है ...आँखे धीमे से खोलता हु ......मुझे दूर  जलती स्ट्रीट लाइट पर मुडती मोड़ दिखाई देती है ...पीछे मुड कर देखता हु पगली अपनी जगह पर बेसुद लेटी है ...उसकी खराटे हवा में शोर मचा रहे हैं ...मेरे अंदर के डर ने जैसे हल्की  सी  नींद की झपकी ली है ....मुझे अब हल्का सा लग रहा है ...आँख से ठन्डे आंसू पिघल कर निकले हैं ...में अपने घर की गली में हु .....दूर से मेरे और आता एक couple  है ...कान में दोनों के एअर फ़ोन  चड़ा है ...हाफ्ते हुए अंग्रेज़ी में बतिया रहे हैं .....मेरा डर अब पूरी नींद ले चूका है  ......मेने फ़ोन पर टाइम देखा है 4.१५ बजे हैं ..में मुडके एक बार फिर उस सड़क को देखता हु ...वो पगली दूर तक कहीं नहीं दीखती ..मेरे पसीने से भीगी   मुठ ठी  अब खुल चुकी है ..........सामने मुझे मेरा घर दिख रहा है .........सर दिमागी उहा पटक से काफी थका हु आ है....
."किसने सुनी होगी उस पगली की कहानी .........मेने तो नहीं सुनी ......वो  सड़क में दौडते हुए couple  ने सुनी होगी क्या....सुबह की पहली किरण के साथ ही कहा जाती होगी वो  ...किसी दफ्तर या किसी   बड़ी गाडी की पीछे दौड़ती होगी क्या " ....नजाने क्यूँ अजीब से उठ्पटांग मगर वाजिब सवाल दिमाग में हल्की सी हंसी हंस रहे हैं .....


                                      "किसी की चोट गहरी है 
                             किसी का दर्द गहरा है 
                              किसी की चीख गूंगी है 
                              कोई कानो से बहरा है " 


Friday, February 24, 2012

पर्दा



व्यस्त सा ज़िन्दगी का कोना है ..
वो सीलन की भूताह छपी आकृतियाँ दीवार के अपने होने का आधिपतीय जताती हैं..


सुबह का आचानक से दिखा कोहरा अभी भी अपने अंदर ज़मी धुंद का प्रतिबिम्ब सा लगता है
सांस को चंद   मिनटों तक ज़हन में रोक लो तो
ज़िन्दगी अपनी कीमत का अहसास करा देती है
घर पर रखी वो आड़ी तीरची थालियाँ अब फ़र्स पर बेठ सीधे मुह बात तक नहीं करती
वो पुराने प्याले अब उन गरम हथलियों को तरसते हैं
बेफिजूल के कैलेंडर दीवार पर टंग जाने का एक गैर वाजिब ख़याल पाले हैं
वो खुली अटटेचियों के जंग खाए कोने
अब चमकीले रंग से सरमाते नहीं
सबसे पहली डायेरी   के छुटे कुछ पन्नो पर कलम नजाने क्यूँ गश खा कर गिर जाती है
उस पर लिखना एक अरसे से टाला गया है

चौखट पर टंगे परदे सी है ज़िन्दगी
दिमागी कमरों में चले जोड़ घटाने का इल्म तक नहीं होने देती



Sunday, February 5, 2012

वारदात


हर गमे चादर ,अपनी वारिश की सिनाक्थ करती है 
वो धुन्दलको में भी ,इन्साफ की बात करती है
तोड़ देते है जब हुक्मरान होसला इंसान का 
तब टूटती एक आश, बड़ी वारदात करती है

उन अफसरी दस्तावेजो   में .चीख़ों का हिसाब नहीं होता 
वो नुमाइंदे  रोते नहीं ,उन मांस के लोथड़ो को देख कर
क्यूंकि उनकी पोथीइयों का रंग लाल नहीं होता

खाली हैं बस्तियां ,    अब सन्नाटे रहते हैं खंडरों में 
ये बड़ी अच्छी बात है की अब कोई वारदात नहीं होती 
अब डरती हैं फिजायें यहाँ की ,इंसानों से
यहाँ अब इंसानों की बात नहीं होती   


(मरे हैं जो लोग दंगो में उनकी कोई न जात थी .......बेवक्त रोते हैं अंधेरों में अपनों के लिए वो आज भी)

Friday, January 6, 2012

कबाड़ से मिला कुछ कीमती सामान...




 सर्दी ने खुद अपने कसीदे पड़े हैं
लिफाफे में पडी कुछ रूठी और बेतरतीब बेठी यादें जिन्हें मेने तह कर के रखा था .... 
उस दवात में ज़मी वो गाढी अधूरी स्याह्ही
 उस रोज़ मेरे गुस्से का शीकार हुई कलम की निब
मेरे हाथो पर खरूंचे मार कर अपने होने का  अहसाह कराती वो मेज़ की  आवारा कीलें
वो बेसुद पड़ी क्रांती की  कुछ किताबे
झूट फरेब से टकराने को मेरे वो   कुछ अल्हड मिजजाज़ी ख़याल
मेरे मासूम खयालों का  चालाकी का  वो जादूगरी   चोगा
गुम होता कोई मेरे याद का  ज़रूरी दस्तावेज़
कई ज़ेबों वाली   वो मेरे जे कट   में खोई मेरे किसी नए नन्हे पेन की याद
 दू धिया रोशिनी वाला सुनसान खाली  पेन का होल्डर ,
जो बड़ा बवंडर लिए फिरता था नए लाल , नीली कलमों का
उसकी चुपी ,ओर
  मेरी हाल्फ   आस्तीनों की शर्ट का  झगडा आज भी मेरे पुरानी बाजुबंदू के साथ
घर में बीछायी  पुरानी पायदानों का झुक चुका कन्धा ,,
हरी भरी याद की सूख चुकी   झाडियों में मिला मेरा पुराना क्रिकेट बाल  
खिडकियों   पर  ज़मी  वो पुरानी  आवारा धुल
खुद से छुपाया मेरा कोई राज़  
उस रोज़ की आख़री शाम में अपनी ही याद के छुटे किसी धागे से खुद ही उलहज जाता सूरज 
ये सब बाट जो रहे थे किसी कलम की और एक यादो के किसी  उजले कागज़  की
पुराने साल के  कई धुल  भरे पैरों ने जैसे अपने सभी निसानो को खुद  ही साफ़ किया है

सायद नया साल आया है मेरे बागीचे में



 



 

Saturday, November 26, 2011

.....



जीने के बहाने....





सुबह सुबह अलार्म की घंटी बजी है....में बंद करने के लिए उठता हु.....पर उठ नहीं पाता .अपना ही सर का बोझ नहीं उठाया जा रहा है......लगता है गर्दन ने रात भर किसी  के साथ कुस्ती की है....माँ.... में चीखता हु ...मगर आवाज़ भी हलक के अंदर ही मरे जा रही है...में खुद ही उठ कर कोई क्रिम ढूंड रहा हु ....क्रिम लेता हु और गर्दन पर मल देता हु....इस क्रिम की  खुसबू  मुझे काफी अच्छी लगती है ऐसा  में अपने आप  से कई बार कह चूका हु ...सुबह के साथ बजे हैं ...आज कॉलेज की छूटटी समझो....मन में  ये ख्याल बड़े ही धीमे से बोल  रहा है ,मै  रजाई के अंदर मुह दबा कर एक और सपना देखने की कोशिश में हु ....घडी का दूसरा सेट किया अलार्म भी बज चूका है....में  अपने बिस्तर को संभालता धीमे  से बाथरूम की ओर हो लेता हु.....नीद में  झूमती मेरी  आँखे और सुसताते मेरे हाथ टूथ ब्रुश को नजाने मेरे मुह पर कहाँ कहाँ  भीड़ा रहे हैं ..सब निबटाते मुझे  11 बज ही जाते हैं.....फ़ोन की घंटी बजी है ....महेश है..... कॉलेज के  फर्स्ट इयर में मिला था  मुझे .....मुझे अस्पताल जाना है सर्टिफिकेट लेने....जल्दी पहुँच......वो कहते साथ ही फ़ोन काट देता है ....महेश का अभी आर्मी में सेलेक्शन  हुआ है....में फटा फट थाली में भीगाये दो मुठठी  काले चने उठा चल देता हु.......में रास्ते में हु...महेश कई बार फ़ोन कर चूका है.....में ठीक 12 बजे उस तक पहुँचता हु...वो मेरा सरकारी अस्पताल की  पुरानी बिल्डिंग के  बहार इंतज़ार कर रहा है ...अपना बैग मेरे हाथ में थमा वो ......लम्बी लाइन में लग जाता है......साला सुबह सुबह कहा  ले आया.....अस्पताल  से आती सैकड़ो तरह की बदबुओं से  तो दम निकला जा रहा है...में महेश को मन में कोस रहा हु.......ताज़ी हवा लेने में बिल्डिंग से बहार लॉन की तरफ  हो लेता  हु.......उफ़ ये गर्दन का दर्द तो मेरी  मुलाक़ात आज यमराज से करा ही देगा ..आधा पौन घंटा हर चीज़ को कोसता में चहल कदमी   कर  अपनी  कोफ्त हर  चीज़ पर निकालता  रहा....अपने हाथ में रखे उस बैग को तकरीबन मेने फाड़ ही  दिया है..........में अपनी नज़रो को ज़बरदस्ती अनज़ाने चेहरे पर केन्द्रीत कर रहा हु......सायद कोई जाना पहचाना मिल जाए.......वैसे भी अपने ही सहर  में जब सब चेहरे नए हो तो सहर भी अपना कोई दूर का रीसतेदार लगता है......आडी तीर्छी घुमती मेरी  नज़र एक चेहरे पर  आकर रुक गयी .....dermatalogist  डिपार्टमेंट के  बहार खडी पीले suit  में वो लड़की वहीँ लगे किसी पोस्टर को बड़े गौर से पड़े जा रही थी....




मेरी नज़र बहुत देर तक उस पर टिकी  रही ...... मै  उसे लगातार पहचान नै की कोशिश कर रहा हु ......ये मुई  याद दाश  को भी क्या हो गया है में अपने हाथ पर रखे बैग को  खुद के सर पर मार देता हु ......काफी देर से खडी उस  लड़की को देख मन ठहर सा गया ....वो अब फ़ोन पर किसी से


बात कर रही है  ......नजाने कौन है  .में उस पर  ध्यान हटाकर   मुड़ने की


कोशिश में हु......उस धुंदली याद ने मेरे दिमाग पर फिर से एक  ज़ोरदार प्रहार किया है..........प्रेयर  के वक़्त लड़कियों  की लाइन में तीसरे नंबर पर खडी होने वाली   लड़की थी वो ...उसका चेहरा मुझे  मेरे दिमाग के तहखाने से मिले किसे अधूरे अभिलेखों के तरह लगा जिसमे कुछ फटे पुराने कागज़ के टुकडे रखे  हैं अधुरी सुचना के साथ  ...नाम के साथ मेरा मन अभी भी खिलवाड़ कर रहा


है...."साक्षी"......."संध्या".या ..."सुरभि'.... अपनी यादों के अखाडे  में कई पुरानी यादों को पठ खनी देने के बाद आखिर कार मुझे  उसका नाम याद आ ही  गया सुरभि था उसका नाम


.......पहली बार मेरी मुलाक़ात उससे नवी क्लास में हुई .......वो हमारी  क्लास में नयी थी ...फ्रेश मुर्गा आया है ...किसी भी नए  बच्चे  के आने पर हम चुटकी लेते  थे  .....गर्मी  की छुटीयों के बाद एक नए चेहरे ने ज्यों ही क्लास में परवेश किया तो पीछे से एक जानी पहचानी आवाज़ ने अपने अंदाज़ में कहा.........सुरभि जाओ वहा  बैठ जाओ क्लास teacher ने मेरी  ओर इशारा करते हुए  कहा था   .....वो मेरी row  में मेरी ओर बड़ते हुए ठीक मेरे  पीछे वाली सीट पर एक बहुत ही वज़नदार  शरीर    वाली लड़की के साथ  बैठी थी ....मेरे चेहरे पर एक बचपन वाली हंसी छूट आयी  थी...वो खुशकिस्मत थी ..ऐसा मै  नहीं मेरे साथ के सब उत्पाती बच्चे जानते थे ......आखिर वो हमारी क्लास की मोनिटर के साथ   बेठी  थी ...........मोनिटर की कैमरे जैसे निगाहों ने एक बार हम सब उतपाती  बचचौं पर नज़रे  फिरआयी  हैं ..और बिना कुछ बोले ही सख्त हिदायतओं के फरमान ज़ारी कर दिए ..." अब आप मोनिटर की होने वाली दोस्त को  देख भी नहीं सकते  ऐसा वो अपनी छोटी आँखों को बड़ा कर कह रही थी ..... पर उस दिन हम सब विद्रोही थे हम सबने उसे पहले से ज्यादा गौर से देखा खूबसूरत और सौम्य चेहरे वाली उस लड़की की आँखे जिस जिस  पर टकराई उन सब की  दोस्ती को उसने मूक सहमती दी ...बहुत जल्द ही उन दिनों वो teachers की चहेती बन गयी ...अब तो क्लास को चुप करना का ज़िम्मा भी कभी कभी  उसे मिल जाता था....


 इस बार साइंस एक्सिबिशन  में तुम जाओगी ...हमारी साइंस  टीचर  ने अचानक से ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिखते हुए पलट कर ये बात कही थी ......हम सब पहले की तरह  ही अपनी बत्तीस्सी दिखाए हंस रहे थे....प्रतीक  ने मुझे  एस बात पर जोर से कोहनी मारी है.....वो इस बात से बेहद नाराज़ था ..वो हमारी क्लास का स्कॉलर था ।और हर कॉम्पिटिशन में उसका नाम लिया जाए उस को  ये आदत डलवा दी गयी  थी ..उस दिन वो मुझ पर बहुत बीफरा ,,तू बता यार कौन डीसर्व करता है इस कॉम्पिटिशन के लिए वो मशीन गन की तरह मुझ  पर सवाल दाग रहा था....में नहीं करता क्या?.... वो ऐसा कई  बार बोल चूका है ......... में उसकी बात अनसुना कर चल देता हु .......महीने चन्द मिनटों की तरह .ऐसे ही देखते देखते निबट गए और  हमारे मिड टर्म भी निकल गए ........प्रतीक  ने एस बार भी टॉप मारा है वो खुश है ......में ठीक ठाक नम्बरों से पास हो गया हु ........ऐसा मुझे लगता है ......सुरभी हमारी क्लास में सेकंड आयी है वो भी हमेसा की तरह हंस  रही है ......छोटी मोटी नोक झोंक के बीच हमारे ज़ल्द ही हाफ इयरली  एक्साम भी निबट गए पता ही नहीं चला  दो दिन बाद रिजल्ट है .....में पास हो  जाऊँगा में रोज़ सुबह उठ कर गायत्री मंत्र का जाप कर अपने आप को तसली देता हु ........आज रिजल्ट आया है......पिताजी को में रिजल्ट देखने को बोलता हु ...खुद टीचर  की डांट के डर से बाहर ही खड़ा हु ....सुरभी  कौन है पिताजी पूछते है ......क्लासमेट  है में हलके से बोल देता हु ......वो फर्स्ट आयी  है अगली बार उस की तरह नम्बर लाना ....मुझे बड़ी हेरानी है अब प्रतीक का क्या होगा ......प्रतीक  ने मुझ से अब बात करना तकरीबन बंद कर दिया है ,वो अब किताबों में ज्यादा समय गुज़ारता  है ......उसको लगता है उसके किले में किसी ने सेंघ लगाई है......वो किसी  जंगली शैर की तरह किताबों का बड़ी ही बेहरहमी से शीकार करता है .....किसी  के हाथ में दीखती कोई नयी  refrence book ...को ...वो  उधार मांग लेता  था ......मेरे नाइन्थ स्टैण्डर्ड के चार मौसम कैसे गुज़र गए पता ही नहीं चला .....हमारे final  एक्साम होने वाले थे हम सब बड़ी जोर शोर से मेहनत पर लग गए .......सबने  अपना अपना बेस्ट दिया.......एक्साम ख़तम हुए  तो रेस्ट के लिए कुछ दिन की छुटियाँ      मिली ....इन छूटीयों में ......में  केवल भगवान् की पूजा करता रहा ......कुछ दिनों बाद रिजल्ट भी आ गया ......हमारे क्लास मे  फर्स्ट के नाम की घोषाडा हुई तो सबसे पहला नाम प्रतीक  का लिया गया आखिर उसका रोब लोट आया था .......सुरभी  एक बार फिर सेकंड आयी.....वो उस दिन भी मौजूद नहीं थी ...हम सब खुश थे पास होने से ज्यादा हमे गर्मीयों  की  छूटियों की परवा थी.......लम्बी गर्मीयों  की छूटियों के बाद हम सब लोटे सिवाय एक के ....


सलीम .....53 नम्बर  है क्या.........किसी  ने डॉक्टर के केबिन से  बड़े ही रूखे अंदाज़ में नाम पुकारा है.....में दुबारा सुरभी  को देखता हु ....वो कुछ बदली बदली  सी लगी है..उसका पूरा चेहरा तकरीबन सफ़ेद हो चूका है ........में उसके पास तक जाता हु.....उसने मेरी  और देखा ..वो मुझे एक दम  पहचान लेती है...तू यहाँ कैसे .....और क्या कर रहा है.....दोस्त के साथ आया हु में उसे कहता हु ....वो आज भी नहीं बदली....उसकी जीवटता  देखकर बड़ी हेरानी होती है.......में ना चाहते हुए भी नजाने  क्यूँ उससे    बैवकूफी भरा सवाल     पूछ लेता  हु ......यहाँ कैसे ...और ये क्या हुआ है तुम्हे .......वो थोड़ा हिचक जाती है .......leukoderma वो हलके से बोलती है.......


इस  बीमारी ने उसके चहेरे की चमक फीकी कर दी है ...पर उसके जीजीविशा  उसे  अभी भी एक आकर्षक व्यक्तित्वव देती हैं    ......."leukoderma" एक अनुवांसिक रोग है ऐसा मेने किसी  अखबार में पडा था....हमने स्कूल की  कुछ पुरानी बातें की ...जब  तक उसे अंदर से डॉक्टर ने नहीं बुलाया ......अच्छा में चलता हु में उससे कहता  हु.....वो फिर हंसती है और bye कहती है.......में अपने कानो पर अपने mobile के ear फ़ोन   लगाता हु.......हम सब अपने अपने मौसम का इंतजार करते हैं और मौसम यादों का हो तो उसके साथ खेलने  का मजा  ही कुछ और है.......में F M की आवाज़ को  बढ़ाते हुए  इन लाइन्स को रटने   की कोशिश में हु .....किसी  ने गाने के फरमाँश की है ......समवेदनाव के तार को झनझनाता  संगीत एक बार फिर मुझे  उसकी ओर  देखने को मजबूर करता है ..उसकी जीजीविशा  देख मेरे मन के अंधेरे कमरे में बुझा दिया एक बार फिर जल उठा है....आज पांच साल हो गए पर वो मुझे नहीं मिली  में डेल्ही में हु और मुझ जैसे कई  लोगो के दिल में ........जो maths  science  से इतर .ज़िन्दगी में हँसते रहने का एक नया लेससन पड़ा रही है. कही पड़ा था मेने ".


जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते….....उसकी वजह से मेरे ज़िन्दगी में नए सुबह आयी  है तो ......मेरे तरफ से good morning teacher ..






"फ़ोन की घंटी ने  मेरी  नींद को एक बार फिर तोडा  है...में घड़ी की और देखता हु ....9 बजे हैं......फ़ोन उठाता हु.....अबे कॉलेज नहीं आना क्या....गौरव का फ़ोन है ....मुझे अभी भी   नहीं लग रहा है की मेने सपना देखा है"




"कभी खोजीयेगा   उमीदों के  खोल.......
सिराने पड़े मिल जाएंगे आपको ...
बस पलक बंद करने की देर है"
                                                                                                                    
 "कुछ सच्चे पात्र और खयालों के धागे हैं ..मेंने अपने तानाशाही दिमाग से अपने विचारों को आजाद किया है...
"मगर कुछ सचची कहानी भी है  जो हमे हर वक़्त जीने की उम्मीद देती है ... सिखा नाम की वो  लडकी   जो ज़िन्दगी के मंच पर herione है  .....जो अपने  चेहरे और टांगो से विकलांग होते हुए भी ज़िन्दगी के मंच पर बखूबी नाच रही है .....वो  अपने छोटे भाई को खूब हंसाती  है  और नौकरी कर अपने माँ बाप का सहारा बनी हुई है ..........रावत जी की मिठाई की दूकान में काम करने वाला  12 साल का सुनील ...बर्तन धोते हुए भी पहाड़े याद करना नहीं भूलता ....है ना ये  ज़िन्दगी मज़ेदार

 

Monday, November 7, 2011

उलझन



मेने कल कुछ रिश्तो  के लछछे  बांधे थे खुटे पर........
अब देखू तो वो लछछे कुछ सुलझे हैं और कुछ उलझे .....

Tuesday, October 4, 2011

शर्म



कांच का बड़ा सा दरवाजा जब चौकीदार ने खोला और हाथ को अपने  माथे   पर रखते हुए कहा " सलाम मैम साहब ". मैम साहब सुन कर महिला के चेहरे  पर एक तीखी मुस्कान बिखर गयी .उसको अपनी अमीरी पर फक्र होने लगा ...रोबीला चेहरा लिए वो अपनी  ६ साल की बेटी को ले दुकान में दाखिल हुई .दुकान के चमचमाते सीसों से टकराते हुए उस ६ साल के लड़की की  नज़र दूर बाहर खडी एक लड़की पर पड़ी .......कमजोर चेहरा ,दुबली पतली कद काठी की  वो करीब १६ साल की  लड़की उन्हें लगातार घूरे जा रही थी. " माँ देखो न उस लड़की को कितने गंदे और फटे कपडे पहने हैं उसने ....अपनी माँ के हाथ को कई बार झटकते हुए . ६ साल की पिंकी ने उस लड़की की लाचारी से झाकते उसके बदन की ओर इशारा करते हुए कहा .........वो बेहद कमज़ोर थी ओरे हर वक़्त अपने कपडे पर लगे लाचारी के चीथडों को संभाल रही थी ...पिंकी की माँ नै अपने हाल्फ स्लीव ब्लाउस को थोडा व्यवस्थित करते हुए पिंकी को झीडकी लगाई ....वो तो बेशरम लड़की है ..शर्म तो बेचने के लिए होती है इनके पास ...वो मन ही मन बुदबुदाई ...."कौन सी  ड्रेस दिखाऊँ बच्ची के लिए" ...दूकानदार अपनी जगह को छोड़ते हुए अभिनन्दन की मुद्रा में आ गया ...फरोक दिखाऊ बच्ची के लिए बहुत प्यारी लगेगी ...दुकानदार ने बात को ज़ारी रखते हुए कहा .......पिंकी की माँ उचक  पड़ी.....अंग्रेजी में कुछ तीखे प्रहार दुकानदार पर दिए......आप कैसी बात करते हैं इस नए ज़माने में फरोक पहनेगी मेरी बेटी.....वो दीखाइये ऊँगली से एक मिनी स्किर्ट की ओर इशारा करते हुए वो बोली ......दुकानदार ने एक बार उस बच्ची की और देखा और एक झुकी नजरो से उस महिला की ओर ...और जोर से चिलाया छोटू......वो तीसरे माले पर रखी ड्रेस दिखाना ........ .उधर वो दुबली लड़की अभी भी अपने कपड़ो को खींचकर कुछ बड़ा करने की कोशिश कर रही है..........शायद कुछ लाज बच जाए...


"हर बार मेने अपनी शर्म की चादर को कई बार सिया है
  मगर इस कम्बक्त बादल   ने बहाने से मुझे बेसरमी की  बारिश में फिर भिगो दिया है "