Total Pageviews

Tuesday, March 29, 2011

वो सीधी सड़क






पैदल चलने का एक अपना ही  मज़ा है ...अरे पागल हो क्या गाडी होती तो बात ही  कुछ और होती ..नहीं नहीं यार खुद के पेरो से चलने में एक अलग ही  आनंद है ....झट से मेरे दिमाग में चलते पहले विचार ने दुसरे  पर हावी होते हुए  कहा .... धूप ऐसे जैसे   मानो   सूरज पर बैठे हो .....अभी अभी बस के रेलम पेल से उतर कर अपने कॉलेज  के तरफ चलना सुरु किया है  .....साला एक गाडी मिल जाती तो ......नाक पर आती उस पसीने की  बूँद को पोछ्ते हुए  में  मन ही मन चिलालाया .......कम्बक्तो  ने कॉलेज  भी  तो जंगल  में बना डाला है...अरे भाई  बनाना ही था तो सहर  में बनाते  ...चलते चलते फेफेड़े हाफ जाते हैं ....तभी जोर से कोई पुराना स्कूटर भन भानते  हुआ निकल पड़ा हमारे सामने से .....बस जैसे दिमाग में जलती आग ने विकराल रूप धारण कर लिया ......गलिया गए साले को....पर कुछ  ख़ास फरक नहीं पड़ा वो तो निकल लिया.... जब गर्दन घुमा कर देखे के शायद हमारे गालियाने की बहादुरी का कोई तो साक्षी  बना होगा...तो कंगाली ही  हाथ लगी .....ऐसा लगा खुद को गलिया गए अकेले में .....एक  फट फटी  मिल जाती तो(रन फिल्म के हीरो के याद आ गयी ) ....हम भी इस १५ मिनट लम्बी सड़क को फुर से पार कर लेते.....  जब भी इस सीधे लम्बी सड़क को देखता हु तो बड़े सारे टेड़े मेडे सवाल दिमाग में आते हैं...(जैसे बर्फ का गोला ...कोका कोला ...आमिर खान .....और डरमी  कूल पावडर )दिमाग में विचारों का दंगल अभी भी जारी है ....सर के नसे  चीगंडे मार मार कर कह रही है बस करो भाई इस धूप में चलना ...पर जो भी हो ..... में अभी कितना भी चीख लू  चीला लू मगर अगर दिन के अंत तक कोई चीज़ याद रहती है तो वो है ये १.५ कम लम्बी सड़क...एक नन्ही सी पसीने के बूँद ने इस वीरान सड़क पर मेरा  बखूबी साथ दिया है....गर्दन से होती हुई जो पीठ पर पहुँची है तो लगा जैसे ....जन्मो से प्यासी गरम रेत पर नदिया ने रास्ता बना दिया ...जब भी इस सड़क पर चलता हु ....तो नाजाने क्यूँ मेरी मुलाकात मुझ  से हो जाती है....रोज़ अपने से मिलने का  मौका ये १.५ k m लम्बी सड़क मुझे  देती  है ...पुरे दस मिनट तक अपने आप से और इस सड़क से  बात करता हु और कभी कभी तो इस अवधि को जान बुझ  कर बड़ा देता हु.. पौ पौ करती एक बड़ी गाडी जो अमूमन इस रास्ते पर कम ही  चलती  है  मेरे बगल से बिजली की  रफ़्तार से निकल गयी .....कसम से कहीं और होते तो बोलते उस गाडी वाले को रुक देखता हु तेरेको  ....मगर आधय्तम के गुंड भी भर दिए इस सड़क ने मुझ में ......एक दो लोग दिख  रहे है कॉलेज  की  और से आते हुए....बोझील  चेहरे लिए.....बड़ा धीरज     है इस सड़क में फिर भी  हंस के स्वागत करती  है    .....छननी  हथोडो  के आवाजें तेज़ हो गयी  हैं..शायद कहीं मरम्मत  का काम चल रहा है...मेरे कदम अभी हलके हैं...क्लास के लिए १५ मिनट लेट हो गया हु   ..... ......कॉलेज का गेट चिलचिलाता हुआ दिख रहा है ...थोडा थका हुआ.........शायद गर्मी से ......बैठ जा ...अरे अब invitation  दू क्या बैठ जा ....मेरे क्लास मेट की आवाज़ थी...जो या तो अक्सर लेट आता है अपनी कार में   ...या तो  आता ही  नहीं है.....उसके उस वक़्त पड़े खलल से  मुझे  ऐसा लगा जैसे वो मुझे  ज़बरदस्ती मेरे किसी जिगरी  दोस्त से अलग कर रहा है...मन हुआ बोल दू "नहीं बैठ ना तू निकल.....पर फिर एक प्लास्टिक इस्माईल   चेहरे पर चिपकाये कहा यार अच्छा  हुआ तू  आ गया "उसने कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया....उसके उंगलियाँ म्यूजिक प्लयेर की ओर बढ गयी...गाना चल रहा है गडडी मेरे देख आवाज़ मारदी  या शायद ऐसे ही कुछ ...आवाज़ वो कभी कम कभी ज्यादा करता है .....में गाडी में दुबक के बैठा हु ....उसको बोलने की हिमत नहीं है की गाना रोक दे ...में पीछे मुड मुड कर उस सड़क की तय की दूरी को आँखों के स्केल से नापने के कोशिश कर रहा हु .... आज रास्ता पांच मिनट में तय हो गया .......बड़ी टीस है मन में वो सड़क मुझसे दूर जा रही है............. कॉलेज  ख़तम होने को चंद रोस है.......

एए सड़क तुझ से अब किस मोड़ पर मिल पाना होगा....
में तो चला अब... तो  नए सहर   में मेरा ठीकाना होगा ....                                                                  फिर मिलेंगे  दोस्त 

Wednesday, March 23, 2011

नौकरी


वो बिस्तर पर लेटी आँखे ,
हर रोज़ मुझे पूछती है ,
रोज़ मेरे ओर वो एक 
पुराना सा सवाल उछाल देती है
पूछ ती  है बेटा जी तो लोगे न मेरे बीना 

मेरा यूँ कमरे में चले जाना उन्हें बहुत सालता है 
यूँ मेरा सवालों पर निरुत्तर हो जाना ,उन्हें  बहुत काटता है 
हाथो में देख  कागज़ के गठठे, वो आँख चमक जाती है ,
और देख उस उदास  चहेरे को वो ख़ुशी दरक जाती है 
 यह सिलसिला सालो साल की  एक कड़ी है 
आँख कब की  बंद हो जाती ,मगर
मौत  और मेरे बीच जीमेवारी खड़ी है

वो निगाहें  हर वक़्त कहती  है
तुम्हारे हाथ में में इस खंडर महल की चाबी दे देता 
मगर तुम्हारे और इस चाबी के बीच में नौकरी खड़ी है 


Monday, March 14, 2011

परम्परा


लोग पुछते हैं की क्या तुम जानते हो
हमारी परम्परानो और मान्यताओ को मानते हो 
मेने छोटे मन से पूछा ,कैसी मान्यता  
उत्तर मिला तुम नहीं जानते 
यह हिन्दू है ,यह भगवन को पूजता है
यह मुस्लिम, इसका सर केवल अल्लाह के लिए झुकता है 
और यह सिख है और यह ईसाई 

यह कैसी  मान्यता ,जो दिलो को दिलो से दूर करती  है 
यह कैसे परम्परा, जो जीवित स्त्री को सती करती है .
मेने कहा के मेरा मन तो इन सोचो से दूर है
दूर है ! इसका मतलब तू यहाँ की  नहीं विदेशी धुल है ..

यह कैसी  मान्यता जो त्योहारों पर पशुओं  का  नरसंघार करती  है 
और उन्हें के खून से अपने भाग्वान का श्रींगार करती है 
यह कैसे मान्यता ,की अपने सुख में दूसरो को दुःख दो 
गर्दन पर चाक़ू फिराओ और बोलो मत रो 

Thursday, March 3, 2011

किनारे पर रखा मेरे यादों का कटोरा



अक्सर में लिखना तब सुरु करता हूँ ,जब अपनी तबियत थोडा नासाज़ पाता हूँ .आज भी सर भारी है ....और ज़मीन आड़ी तीरची नज़र आ रही है ...तो सोचा दिमाग में कुछ  ज्यादा ख्याल भर गए है तो बेहतर होगा के उन्हें .....कागज़ पर उड़ेल दू ... तो बस बैठ गया बीस्तर  पर गुमटी मार कर ....अब काफी देर निठ्ला बेठा रहा तो लगा की  चलो पुरानी एल्बम ही  देखि जाये...काफी उथल पुथल मचाने के बाद आलमारी के भीतर वाले खाने में आख़िरकार वो यादों की  पोटली मिल ही गयी ......देखकर ख़ुशी इतनी हुई ,जैसे नजाने कौन सी  जंग जीत ली हो....खैर जैसे तैसे उस एल्बम को बहार निकाला और थोडा झाड़ा ,क्यूंकि आस पास कोई कपडा नहीं दिखा तो ...ज्यादा झाड़ने की जहमत भी नहीं उठाई ..
एल्बम को झटके से पकड़ कर बीच से खोल डाला...और देखा की कौन सी  फोटो मेरे आँखों  के सामने पहले आती  है...ऐसा खेल में छुटपन में बहुत खेलता था ...आज एक बार फिर कोशिश की ...सिर्फ कोशिश हाँ ....खैर जिस फोटो पर मेरी  पहली  नज़र पड़ी  ,पूरा दिन में उस ही फोटो को लेकर घूमता रहा ....वो कोने रखी एल्बम का अगला पन्ना पलटना तो में भूल ही गया...फोटो थी मेरे उन पुराने दोस्तों की ..जो नाजाने अब कीन कीन जगहों पर है .तस्वीर उतनी साफ़ नहीं थी ..काफी धुंदली थी ..पर उन सब दोस्तों के चेहरे ,और यादें एक दम तेज़ी से दिमाग में कौंध  गए ...वो स्कूल छुटने के आखरी दिन बहुत तेज़ बारिश हुई तो सबको ठीक से बाय भी नहीं कह पाया...कुछ दोस्त रूठे हुए थे...तो उनको सॉरी बोलने की  तमन्ना दिल में हीरह गयी..आज वो दोस्त सामने होते तो गले लगा कर कहता सॉरी  यार भूल तो नहीं जाओगे... पर वो इच्छा पूरी नहीं हो पायी तो आज उन सारे दोस्तों के फोटो देख मन ही मन सॉरी कह दिया..आजकल कॉलेज में हूँ और कॉलेज खत्म होने को चंद दिन रह गए हैं ...और कुछ लोग रूठे हुए हैं ..इस  फोटो को देख कर लगा की पांच साल हो गए ..स्कूल छोड़े  और एक फोटो मेरे हाथ में है और मुझे   अफ़सोस है ...की  उन दोस्तों को गले लगा कर नहीं बोल पाया" यार तुम बहुत याद आओगे " में नहीं चाहता की अगले पांच साल बाद मेरे हाथ में एक और फोटो हो ......और में फिर उनके फोटो को बोलू यार तुम बहुत याद आओगे ........तो मेने सोचा है की इस से पहले की मेरी  यादों के फूल  अपनी अपनी खुस्बूऐन लेकर अलग अलग बिखर जाये ....में इन्हें एक बार फिर से अपने अंदर भर लेना चाहता हु ... तो मेरा ख्याल है की किनारे  पर रखे मेरे यादों के कटोरे को खोलने का टाइम आ गया है...तो कैसा ख्याल है जनाब .....

Tuesday, March 1, 2011

मोड़


टक टक टक टक पेर है मेरे, वो सड़क अकेली लगती है .
पीछे छुटी वो मोड़ मुझे , कोई बिछड़ी सहेली लगती है .
इन पथरीले रास्तो  पर पत्थर की चुभन भी ठंडी  लगती है
ज़िन्दगी के इन सुनसान रास्तो में ,निकलती खून की अपनी  धार भी अत्ठ्कैली  लगती है 

उस पीछे छुटी हर मोड़ की  धुप नवेली लगती है.
 उन मोड़ो पर जाना कम होता है ,
पर नाजाने क्यूँ मुझे मेरी  सांस वहीँ पर दिखती  है
उन मोड़ो पर पहले वसंत दिख जाता था .
ज्यादा नहीं तो कहीं किसी कोने पर एक ,आत फूल खिल जाता था .

उसके यादों के पतझड़ को किताब में संभाले रखता हु
और जब देख सुखी पतियों को आँख भर आये
तो संभाले उसके किसी फूल को देख  हल्का सा हँसता हु.