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Wednesday, August 19, 2015

ऑफिस नामा भाग 4
तो जैसा की पिछली कड़ी में हुआ था ..दरवाज़े पर हुई बेवक़्त दस्तक ने हमारे ध्यान को तोडा और एक बलिष्ट व्यक्तित्व का धनी ..अंदर प्रविष्ट हुआ । हमने कछुए की तरह गर्दन घुमा दी । हमे यकीन था की उसने हमारी मौजूदगी को यूँ ही हलके में नहीं लिया होगा ।पर ठीक इसके उलट उसने रूई के फ़ायें की तरह हमारी मौजूदगी को अपने नथनों की हवा से उड़ा बहार किया । उसकी नज़र मास्टर जी के फीते की तरह सीधी लिफाफे की मुड़ी तुड़ी भुजाओं और उससे झांकते किसी पत्र पर थी । सामने बेठे मेनेजर साहब ने अफसरी अंदाज़ में पुछा क्या है ? बलिष्ट व्यक्ति के कंठ से फटी पीपरी जैसी आवाज़ निकली साहब चिठ्ठी ....उसी वक़्त उसकी बलिष्ठता हमारे सामने किसी फूटे मटके जैसी हो गयी । हमारा आत्म सम्मान लौट आया था । अच्छा इस व्यक्ति का बात निकली है तो बताते चलें की वो सिक्यूरिटी गार्ड था ।यानी की आफिस का एक अहम् व्यक्ति , और आगे इस ऑफिस नामा का भी अहम् किरदार । खैर चिठ्ठी पर लौटते है , साहब ने अध फटी चिठिठ को अपने हाथों में तुरंत यूँ दबोज़ लिया जैसे उपवास पर बेठे किसी शेर को तौला भर मांस मिल जाए। तुरंत उसे फाड़ अंदर के जरूरी तत्व अपने अंदर समेट लिए । इस वक़्त तक चाय ने भी हमारे आगे हाज़री लगा दी थी । ए .सी की हवा में चाय गुलाब जल जैसी हो चली थी, अतः हम चाय को एक सांस में कोल्ड् ड्रिंक की भाँती सुड़क गए । सामने प्लेट पर रखे बिस्कुट पर भी हम कई बार किसी मझे हुए चोर की तरह हाथ साफ़ कर चुके थे। मेनेजर की गर्दन अब भी बगुले की तरह पत्र पर ही घिटी हुई थी । पत्र को देख उनका मुह किसी सूखे अमचूर की तरह हो गया था ।एकदम खट्टा, मेनेजर की नज़र अचानक मेरी ओर घुमी और फिर घडी की ओर,फिर थोडा नकली हंसी चेहरे पर टेलकम पाउडर की तरह पोत दी ।वो किसी चीते की फूर्ति के साथ कुर्सी से खड़े हुए ।और बोले ...यंग मैन ....टुडे यू आर गोइंग टु गेट सम न्यू एक्सपोज़र ....हैन्नन्नन्नन्न हमे याद है हमारे मुह से केवल इतना ही निकला ..। लेटस गो .....सर की आवाज़ फिर लुडक कर हमारे सामने आ गयी .....दिमाग बस ट्रैम्पोलिन पर उछल रहा था ।।।।आखिर चलना कहाँ है ...।।(जारी है)
ऑफिस नामा भाग 3
बचपन में पिताजी से ऑफिस की सेकड़ो दन्त कथाएं सुनी थी । इतनी ,की सुनते सुनते हम होंठ तो होंठ दांतों को भी चबा जाया करते थे। वही ख़याल मन में रह रह कर खाली टिन की तरह बज़ रहे थे। यूँ तो मेनेजर के प्रवेश द्वार और हम में मात्र चंद उछलते कदमो की दूरी भर थी। मगर नजाने क्यों फासला मीलों का लग रहा था । खैर ये मीलों सा फासला हमारी सांस को एक बार अंदर बहार खींचते ही समाप्त् हो गया ।और हम किसी अनजान पशु की तरह नौसिखिये से ,अपने मालिक के सामने प्रस्तुत हुए । मेनेजर साहब ने हमको देख अपनी आँखे इतनी जोर से सिकोड़ी ,लगा की वो अपनी निश्चित जगह छोड़ ,भीतर को गिर पड़ेंगी। ठीक उसके उलट हमारी आँखें चौड़ाई के सारे मापदंडों को पार कर गयी । तो आप हैं नए ....ये सुन मुझे मार्किट में उतरे किसी नए साबुन जैसे अहसास हुआ .....उनके इस वाक्य ने कुछ देर सरीर में अलग अलग दीशाओं में बहते गर्म पसीने को सावधान की मुद्रा में ला दिया । हमने भी यस बोल अपनी मौजूदगी का अहसाह कराया । मेनेजर साहब ने यस का सारा रस हमारी बात को अनसुना कर निकाल दिया ।ये तो अफसर वाली बात हो गयी , जैसा की पिताजी अपनी दन्त कथाओं में विवरण दिया करते थे ।हमारे मन में विचारों के काले बादल आपस में भिड़ने लगे। वहीँ पास ही उस केबिन में मेनेजर के दायें ओर एक और अफसर नुमा कुर्सी थी । पर साइज़ में थोड़ी छोटी थी ।उसने हमारा ध्यान समेट के अपनी और खींचा ।अब बात दिमाग के कोष्ठक में पालती मार के बेठी। की, चेयर मैटर्स,जितनी बड़ी कुर्सी उतना रोबीला पन। प्लीज टेक योर सीट ...मेनेजर इस बार फ़ाइल से कट्टी कर मेरी ओर मुखातिब हुए। उन्होंने प्रश्न दागा ....यू आर फ्रॉम ......हमने झटक के टंग को रोल कर अमेरिकन एक्सेंट में देहाती अंग्रेजी परोस डाली .....आई ऍम फ्रॉम देहरादून। ....संवाद का अभी पहला चरण ही था ..मगर हमारी तयारी आखरी चरण तक पक्की थी .....अगले प्रश्न के जवाब को और बेहतर देने को हमने अपने सूखते गले के कुएं से पाव भर थूक खींच लिया ।......इससे पहले की हम तयारी में और धार ला पाते....।दरवाज़े पर दस्तक ने हम दोनों के ध्यान को तोड़ दिया ........(जारी है)
ऑफिस नामा..भाग -2
ऑफिस में प्रवेश कर अपनी बची कुछी आवाज़ बटोर हमने चपराशी के समुख्ख किसी पुराने नोट के भाँती सवाल उछाल दिया ।वो भी जैसे तैयार ही बेठा था, सवाल को आतिशी अंदाज़ में पकड़ने को । हमने बिना लॉग लपेट के सीधा पूछा मेनेजर साहब से मिलना है । चपराशी का होंसला तुरन्त चौकीदार की तरह खड़ा हो गया । जैसे हम जैसे कबूतरबाज़ों से निबटना उसका रोज़ का काम हो । उसके कैक्टसनुमा आवाज़ ने शब्दों की कोई बाज़ीगरी न करते हुए एक काँटा मेरी और फिर फ़ेंक दिया । क्यों? .हमने तुरंत किसी फराटा धावक की तरह जवाब दिया । ज्वाइनइंग लेनी है । अब रास्ता बताएँगे। राजसाही चपराशि ने अपने जुबान पर नियंत्रण का भाव हमे जल्द दे दिया । "जी जरूर " वो कुछ इस अंदाज़ में बोला ,जैसे किसी नास्तिक के हाथ में बेमन से रखा फूल धक्का लगने भर से भगवान् के चरणों पर अर्पित हो जाता है ।
खैर वो हमे मेनेजर के पास ले गया । मेनेजर कोई युवा महिला थी ,मन प्रफुल्लित हुआ ,इतना की हाथ स्वतः उठा और मेनेजर के आगे पेंडुलम की मुद्रा बना ,हाथ मिलाने की इच्छा ज़ाहिर करने लगा ।उन्होंने देर लगाई ,पर हाथ मिला हमे किर्तार्थ किया ।हमने फोल्डर से बोल्डर नुमा जोइनिंग लैटर का गट्ठा निकाल उनकी टेबल पर रख डाला । हम आस्वस्त थे की जब तक वो पोथी की गुत्थी सुल्झायेंगी ,एक कप चाय हम तब तक गटक चूकें होंगे । पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ,मेनेजर साहिब हमारी सुस्त सोच से काफी चुस्त निकली ।तुरंत बोली आपको यहाँ नहीं दूसरे डिपार्टमेंट में ज्वाइन करना है । हमारी निगाहें घूमके चपराशी पर टिक गयी। वो हमे और हम उसे कुछ देर तक गुस्से में घूरते रहे । इतनी बात तो अब तक हमारी समझ में आ गयी थी । की आप ऑफिस में भले अपनी इच्छा से करारे पठाखों की तरह जाओ ,पर ऑफिस में तुम्हे सीले और फिस्स होने का अहसास ही कराया जाएगा ।और करारे होने का भ्रम जो फिर भी न टूटा ,तो ऑफिस स्वयं को माचिस की तरह प्रस्तूत करेगा । की वो जली और आप फिस्स हो जाओगे।। खैर वहां से हमने रूख किया अपने डिपार्टमेंट की ओर.,..अंदर ज्यूँ ही प्रवेश किया ........(जारी है)
ऑफिस नामा 
यूँ तो ऑफिस कोई ऐसा इलाका नहीं है जहाँ आपको सुख की कोई अनुभूति हो । पर हमे थी ,पहला दिन था तो अंदर समन्दर हिलोरे मार रहा था । हमे डर भी था की कही मुह के रास्ते बहार न आ जाए । वो हुआ यूँ की एक्साइट मेंट में चाइ नास्ता ज्यादा ठूस लिए थे । खैर तयार हुए और ऑफिस की ओर रवाना ।ऑफिस की कल्पना की जाए तो वो किसी अखाड़े से कम नहीं होता । जिसमे ऑफिस में मौजूद हर कर्मचारी को अपनी अपनी ताकत का बखूबी अंदाजा है ।में तो कहूँगा की खिलखिलाती ज़िन्दगी को लंगड़ी टांग मार गिरा देना का ज़िम्मा ऑफिस ने अपने पास रखा है ।ये भले दफ्तर के दस्तावेज़ में किसी नीली गहरी स्याही से न दर्ज़ हो, पर दफ्तर में मौज़ूद सभी के दिलो दिमाग पर खूटें के माफिक घिंटा पड़ा है । नए नए ऑफिस की सुगंध में अपने पहले दिन को लोट पोट करने को हम बड़े आतुर थे।अपनी नयी बुसट की क्रीज़ को हम इतनी बार हथला चुके थे ,की हाथ के रेखाऐ हाथ छोड़ अब बुसट पर जा छपी थी । मुखमंडल से लेकर नुकीले जूते की नोक तक सब टिप टॉप ।अब बाकी था तो प्रवेश करना । हमारी कल्पनाओ के पंछी पंख लगा चुके थे । हमने अभिमान के साथ ,शर्ट झाड़ने के बहाने खुद को थपकी लगाई । कौन हो भाई ...पीछे से किसी कर्कश आवाज़ ने हमारे खूबसूरत कल्पनाओं के पंछियों को ""हुर्रह्ह्ह "की आवाज़ के साथ उड़ा दिया । चपराशी था ......मालुम पड़ता था सुबह उठ कर जो सबसे पहला कार्य वो करता होगा वो ये की कैक्टस से कंठ को बुरी तरह ज़ख़्मी कर देता होगा ।ताकि आवाज़ सनी देओल स्टाइल में निकल सामने वाले पर पैठ जमा सके ।वैसे वो कुछ हद तक सफल भी हो गया था । खैर उस राजसाही चपरासी के सामने हमने जैसे तैसे अपनी बची खुची आवाज़ बटोरी और पूछा । .........(जारी है)

Saturday, May 2, 2015

धड़ाम इश्क़



उसे तब प्यार का अहसास नहीं हुआ जब माहोल में प्यार के वो सारे मूल तत्व मौज़ूद थे । हवा में जब मदहोश करने वाला सिग्रेट के धुऐं का उपस्थित होना अनिवार्य था । जब जाम थे ,सेंटीमेंटल कहानियां थी ,जटिल प्रेम कथ्यों को सुलझाने को गुरुदत्त  थे ,उलटी और आंसुओं की  गंध मे कई प्यार की कहानियों को ज़मीनो दंज़ करने का इतिहास था ।  वो वक़्त मुफीद था ,पर नजाने उसे प्यार के कीड़े संक्रमित क्यों  नहीं कर पाये । कॉलेज उसके लिए वो लॉन्चिंग पैड नहीं निकला। या निकला भी हो और उसने  भूरी भूरी किसी नव युवती की पृशंसा भी की हो ,पर हमारे पल्ले कुछ न पड़ा।

सायं 8 बजे

ट्रेन निकलने की आखरी घोषणा  , उसके हृदय गति लगभग दोगुनी रफ़्तार से दौड़ रही है । दून एक्सप्रेक्स प्लेटफार्म नंबर 1 पर खडी है । ट्रेन का नंबर उसे अपनी बढ़ती का उम्र का अहसास करता है ।एनाउंसर फिर से घोषड़ा करता है ,उसके जेहन में  बस एक ही ख्याल है जल्द से जल्द  होवरह पहुंचना । मन ट्रेन की गति से तेज़ हवारह पहुँच जाना चाहता है । उठते विचार दिमाग के खांचे में फिट नहीं होते । ट्रेन के दरवाज़े खुलते साथ ही मयंक ने अपना कोना पकड़ लिया ।नौकरी के बाद ये पहली  लोंग जर्नी थी उसकी ....अब काम का दबाव भी तो पहले से बेहद ज्यादा था ।  , फिलहाल तो यही काफी था  ईश्वर को शुक्रिया कहने को .की उसकी छूटी की अर्ज़ी लग गयी थी .... किस्मत साथ थी आज उसके  , सीट भी एकदम पसंद की  मिली .थर्ड ऐ सी मे अपनी पसंद  की सीट मिल पाना  यूँ भी इतना आसान नहीं होता ।


एक साल के दौरान उसे खुशनुमा अहसास बस तब ही हुआ था ,जब उसकी मुलाक़ात रूपाली से हुई थी । लाल iimc की बिल्डिंग के बहार वो पहली थी जिसे देख उसको बस यूँ लगा की नयी स्फूर्ति का ठंढा झौंक   । वरना दोस्त तो सारे मातम मण्डली अपनें चेहरे पर जमाये रहते थे । नौकरी ज्वाइन करते साथ    ट्रेनीस को जब  iimc में बेझा गया तो तकरीबन सबके मुह इस मुद्रा में खुल गए जैसे ये बस सपना भर है और कुछ देर बाद उनसे छिन जाने वाला था  । बस एक वो ही थी जिसे देख लगा की वो इस चीज़ की हक़दार है । बहरहाल 40 दिनों तक रूपाली के साथ एक सुखद अहसास की अनुभूति हुई । चटख धुप और कोरी सड़को पर भी उसकी मौजूदगी की खनक उसे पहली बसंती धुप जैसे लगती । जनाब अपने को हर कोण से वैसे भी कमतर ही आंकते थे .......सरकारी स्कूल की बैत से शूत  शूत कर पढ़ाई का ककहरा जो सीखे थे । आत्मविश्वास पर तो  मास्टर जी का पेटेंट था ..कभी बढ़ने  नहीं दिया ..जब कोशिश की ....बस दे दना दन सूत दिया करते थे ........एक बार की बात है भाषण प्रतियोगिता में भाग लिया ....इण्टर स्कूल प्रतियोगिता थी ...हमारे स्कूल को भी आमंत्रण मिला .......गहन खोज बिन के बाद तय हुआ की  हमारा मित्र स्कूल का प्रतिनिधित्व करेगा । क्योंकि दिखने में वो थोडा ओरो से धाँसु लुक का  था  ,तो उसका नाम सुझाया गया ।नस्ल बेध का पहला पाठ भी हम यहीं सीखे भाषण  प्रतियोगिता में सम्मलित होने  को मित्र ने नयी बुसट और पतलून भी सिल्वा ली ...टीचर को हमारे नाम का सिफारशि लैटर भी थमा दिया .ताकि हम भी सम्मलित हो सके प्रतियोगिता देखने को ...भैये टक्कर कोई औने पौने स्कूल से तो थी नहीं .......एक से एक धांसू स्कूल थे ..... । चमचमाते गाड़ियों से निकलते एकदम मलाई नुमा बच्चे , खासतौर पर कान्वेंट छोकरियों को देख कर  तो दिल भक हुआ जा रहा था । मित्र  भी माँ का आशिर्वाद ले दही पैल कर आया था  । वैसे भी मालूम था वहां  मौज़ूद श्रोताओं को हमारी स्कूल की ओर से छांछ ही बटेगी । पर हमारी जमात के एक आत स्कूलों की  उपस्थति ने  हमारा आत्म विश्वास में थोड़ी बढ़ोतरी कर  दी ।  प्रतियोगिता बस शुरु होने से पूर्व ही   अपनी जमात के स्कूल के वक्ताओं से हमारी अच्छी जान पहचान हो गयी ।वो भी हम जैसे ही घोड़ो की तरह कभी स्कूल के सभागार को तो कभी छोकरियों को निहारे जा रहे थे ।और ऐसा निहारना बनता भी था। खैर   हम तो जानते ही थे ये भाषण प्रतियोगिता से ज्यादा भसड प्रतियोगिता होने वाली थी । पर  मैदान में कूद चुके थे तो अब मोर्चा संभालना अनिवार्य हो गया था ।प्रतियोगिता आरम्भ हुई, पहली वक्ता स्टेज पर उपस्थित हुई ,उसकी चेहरे की कांति मंच की शोभा  को चार चाँद लगा रही थी ।पहली वक़्ता अपनी बात रख लौटी तो हवा मे तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी ,मित्र की हतेली पसीने से तर गयी ।अब बारी थी दूसरे छात्र  की  जो कोई आर्मी स्कूल से था । बलज़्ज़ेर्स वगरह चढ़ा के आया था ।हमारे  हाथ आनायस ही अपनी हैण्ड   मेड स्वेटर की शोभा यात्रा कर आया । यूँ तो एक एक कर सारे वक़्ता बड़ा ओजपूर्ण भाषण दे रहे थे ,सिवाय कुछ वक्ताओं के  जिनके भाव उनकी भाव भंगिमा का साथ छोडते नज़र आ रहे थे । वो मेज़ पहले पटक दे देते और उग्र भाव  मेज़ की आवाज़ मंद पड़ने के बाद प्रकट होते ।परंतु ये भी हतप्रभ करने की अपनी एक विधा होती है ।ऐसा दाव  हमारी जमात वाले स्कूल के वक्ताओं न ज्यादा आज़माया  ,ज्यादा क्या मल्लब हमी लोगो ने किया  ,पर जो  ख़ास बात थी वो तीसरी वक्ता में थी । और वही थी जो अपनी वाक् शैली से हमारे  मित्र के दिल में घर कर गयी थी ,अपना मारा रट्टा तो हमारा मित्र  तकरीबन  भूल ही चूका था  । अब सब कुछ   राम भरोसे था और कुछ हाथ भरोसे ,जिसमे हमारा मित्र कुछ  मुख्य अंश अंकित किये बेठा था ।ये आईडिया मास्टर साहब का ही था ।


खैर तीसरी वक्ता ऐन मेरी स्कूल की थी ,जिसे देख बस डी डी एल जी जैसी फीलिंग आना सुरु हो गयी थी । यानी सीधे सब्दों में बोलू तो भैया लव बाईट था ।  उसके घुंगरेले बाल दूध में भीगे सेवैंय जैसे प्रतीत होते थे .......उस वक़्त खूबसूरती को दर्शाने हेतु ऐसे विषेशणो  का इस्तमाल ज्यादा होता था । खैर जैसे तैसे अपनी बात रख मित्र अभिमान की मुद्रा में लौट आया  । दोस्तों ने  खूब होसला अफ़ज़ाई की ,पर मास्टर जी तो कुटाई करने की मुद्रा में नज़र आ रहे थे ।पर हमे इससे क्या ,हमारा सारा ध्यान तो उस तीसरी वक़्ता की जनम कुंडली निकालने में ज्यादा था ।तय हुआ की वही स्कूल के गार्डन में  उजाड़ मारी कर कुछ फूल लाये जाएँ ,और लड़की को   कुछ फ़िल्मी तरह से इप्रेस्स किया जाये । तो भैया फूल  का गुलदस्ता तो हम एकदम टनाटन रेडी कर लिए ,अब तलाश थी सही समय और जगह की ,तो वो समय भी आया ,ज्यूँ ही प्रतियोगिता समाप्त हुई  । मित्र और हम चल दिए प्यार का इज़हार करने , हमारे मित्र की  तरह पुरुष्कार तो वो भी नहीं जीती थी बस एक चौकौर सा सर्टिफिकेट अपने हाथों में करीने से लिए आ रही थी । अपना वाले सर्टिफिकेट का  तो अपन लोग कब का पंखा बना चुके था । मालुम था मास्टर जी पैदल ही रास्ता नापवाएंगे..... जब तक की हम सबका धाँसु लुक धुप में अपनी काया न छोड़ दे  ,तो हम सोचे की तब तक थोड़ी ठंडी हवा ही खा ले । यूँ  तो हमारे दीमाग में  इश्क को इहज़ार रुपी किर्या तक ले जाने का पूरा खाका तैयार था पर ज्यूँ ही वो सामने मुखातिब हुई । मित्र की ठंडी आहें कब गहरी से गरम और फिर धड़ाम  हो गयी  हम खुद भी इस बात से अनभिज्ञ थे । अंग्रेजी में हम और हमारी मंडली वैसे भी सीले पटाके जैसे थे । किसी ने तिल्ली दिखाई नहीं की  हम छुश बोल जाते थे ।और वो ठहरी कान्वेंट की ... ।  हमने हलकी सी बतीशी क्या बिखेरी वो सीधे हॉय बोल गयी और बोली ...यू स्पोक वेल । सर  पर ठंठनाते हुए अंग्रेजी हवा में कही लुप्त हो गयी ,


अब मित्र और हम में इस बात को लेकर विवाद हो गया की बोले वाक्य में प्यार था या कड़वाहट।खैर तय हुआ की अगली सुबह अंग्रेजी की टीचर  से समाधान  ढूंढा जाएगा । और अपेक्षा अनुरूप सब्द का अर्थ वही निकला जो हम  बोले थे । यानी की वाक्य प्यार की चाशनी में डूबा था ।पर अब देर हो चली थी ।पहला इश्क़ धड़ाम हो चला था, यानी की पूर्ण विराम ।उसके बाद  हमारा कुछ चीजों को लेकर अपना मत बन गया ,जैसे की बड़ी बड़ी स्कूल के आहतों पर बंदरों की तरह लोट पोट करने वाले बच्चे भी हमे अपनी स्कूल में अव्वल दर्जे के छात्र लगत थे । और अपनी स्कूल के पहली पात के छात्र भी इन्ही स्कूलों में हमे अक्सर लंगूर नज़र आते ।सायद कुछ  हद तक ये सत्य भी था ।जीवविज्ञान का सिद्धांत सुर्विअवल ऑफ़ टी फिट्टेस्ट हमारे दिमाग के कोस्टख में  बाखुभी दर्ज़ था ।नवी दर्ज़े  में  चार्ल्स डार्विन से बायोलॉजी की पुस्तक में  हमारी पहली भेंट हुई  । बस वही दिन था जब हमने डार्विन काका को अपना गुरु मान लिया।

(अभी जारी है )

Friday, April 10, 2015

कलकत्ता ....मेरी जान

गरीबी को पुनः परिभाषित करना है तो बंगाल चले आएये....एक समय हिन्दुस्तान के विकास का ध्वज़वाहक कहे जाने वाला ,अब विकास की पिछली पंक्ति में कही पालती मार के बैठ गया है । देहरादून से हावड़ा जंक्शन पर पहुंचने पर बंगाल के पिछड़ेपन का इल्म बामुश्किल होता है । स्टेशन की भव्यता देख आप उस से मंत्रमुग्ध हुए बिना रह नहीं सकते । हावड़ा और हुगली का मेल निसंदेह कोलकत्ता में आज भी आकृषण का केंद्र है । कतारों में हंसी ठीठोलि करती पीली एम्बसडर टैक्सी दृश्य मे कुछ और चाँदनी बिखेरती हैं ।कुछ कुछ हिस्से तो चंद रोज़ पहले आज़ाद हुए भारत की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। हलाकि, और महानगरो के मुकाबले कोलकत्ता रेस में कुछ पीछे सरकता नज़र आता है । पर फिर भी यहाँ बहुत कुछ है जो आपके तेज़ कदमो को ठिठकने कर मज़बूर कर देगा । अंग्रेजों की राजशाही ज़िन्दगी का सजीव चित्रण अगर आपको देखना है तो सीधे रुख कीजिये विक्टोरिया हाउस का। अगर जानने का मन हो की इतिहास कहा जाके दुबग गया है तो इंडियन म्यूजियम आपको आकर्षित कर सकता है । स्पोर्ट्स लवर हैं तो इडेन गार्डन और खरीदारी के शौक़ीन हैं तो पार्क स्ट्रीट एक लुभावनी जगह है ।पर ज्यूँ ज्यूँ आप सिटी ऑफ़ जॉय को छोड बंगाल के ग्रामीण इलाकों में जाएंगे गरीबी और पिछड़ेपन का जीवन के साथ संघर्ष आपको तक्लीफ़ देह लग सकता है । ऐसा ही एक इलाका है murrarai ...झारखंडः बॉर्डर से सटा होने के कारण कोयले का खूब इस्तमाल होता है । हवा मे धुंध है ,कोल डस्ट की वजह से सुरज पूरी धमक के साथ यहाँ दस्तक नहीं देता । स्वास्थ सेवाओं का भी कुछ ख़ास अच्छा हाल नहीं है । पर जगह जगह तालाब बना पानी संग्रक्षित करने की कला मुझे बेहद पसंद आई । मेरा कुल मिला कर बंगाल परवाश यादगार रहा ।बंगाल के बारे में अभी बहुत कुछ है जो लिखना है अपनी नज़र से ,पर फिलहाल ट्रेन अपने गन्त्तव तक पहुँच चुकी है ,यानी की दिल्ली।बाकी बातें बाद में । जनाब हठीयेगा... थोडा उतरना है .।

Saturday, January 31, 2015

ज़िन्दगी ज़रा रुक के

ज़िन्दगी के कितने ठौर ठिकाने होंगे .कितने मोड़ों के बाद वो रुक कर एक बार फिर से पीछे मुड कर तय किया रास्ता आँखों से नाप लेती होगी ।क्या सच में होगा ज़िन्दगी के पास जहन पड़ने  का हुनर । अपने ही रचे किरदारों को पड़ने की कला । खास तौर पर उन  किरदारों से जिनसे आप बामुश्किल मिले हो, फिर भी वो दिल में दाखिल होने का रास्ता ढूंढ ही लेते हों । उन किरदारों को अगर कागज़ पर न उतरा जाए या कही सहेज कर न रखो तो गिल्ट हावी रहता है ।  पिछले कुछ दिन ऐसे ही किरदारों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी की तरह घुमे ।
फर्स्ट सीन
वो रहा होगा  उम्र में मुझ से महज 2 साल छोटा ,मेरी स्कूल में शायद पड़ता था। कभी मिला नहीं न कोई औपचारिक बात हुई ।बस उसका चेहरा याद है ,पता नहीं कुछ चेहरे याद रह जाते हैं ।सहर के किसी व्यस्तम तिराहे पर चाय के लिए रुकता हु । उम्मीद से ज्यादा थकान चाय की तलब पैदा करती है । हलाकि चाय कम पीता हु ,पर ईततफाकन उस रोज़  वही पर चाय पीने का मन है । टी स्टाल में अपने लिए मुफीद कोना मेरी आँखे जल्द तलाश लेती हैं । जगह के मामले में थोडा स्वार्थी हु ।क्योंकि चाय पीने का मज़ा अपनी मन पसंद जगह पर आता है । सामने नीली धारी की स्वेटर पहने एक लड़का बड़े सटीक अंदाज़ में चाय को ओटा रहा है .कमाल का संतुलन ,चाय की एक भी बूँद हवा में बनाये उसके रास्ते को नहीं छोड़ती । एक परफेक्ट रिंग मास्टर की तरह  ।,वो चाय लिए मेरे सामने खड़ा है । उसका स्कूल वाला चेहरा मेरे सामने घूम जाता है । उसने मुझे नहीं पहचना ,या शायद ऐसा मेरा सोचना है । क्योंकि मुझे देखने के बाद ,उसके चेहरे पर वो भाव मिसिंग है , जिसकी अपेक्षा में कर रहा था। उसमे ढेर सारा आत्म विश्वास है ।शर्म का कोई भाव नहीं ।तिराहे पर खडी दुकान में खड़े होने के बावजूद उसे अपने लक्ष्य और रास्तों का बखूभी पता है।
सीन 2
एक समय था मुझे डाकियों से दोस्ती करने का मन होता था ।एक नहीं दो नहीं  ढेर सारे डाकियों से ,लगता था जितने डाकिये दोस्त होंगे उतने खतों के गट्ठे डाल जाया करेगा घर के भीतर । एक समय था जब ख़त पड़ना मेरा सबसे पसंदीता शगल था। समय के साथ ख़त और डाकिये  ने अपने किरदार बदल लिए । अब नानी ,मामा ,चाचा और नजाने कितने रिस्तेदारों से ख़त  से मुलाकात नहीं होती ....बस फ़ोन पर होती है ।
बहुत दिनों बाद फिर से ख़त लिखने की सोची ,सोचा पुराने शगल में थोड़े प्राण फुके जाएँ, तो बस लिख डाला एक लंबा चौड़ा ख़त , यूँ तो उस ख़त को पोस्ट करने की कोई ऐसी कोई प्लानिंग नहीं की थी ।पर फिर सोचा अब लिख दिए हैं ,तो कर देते हैं ।
भाई साहब कहाँ बेझना है .....जानी पहचानी आवाज़ ....हमारे दिमाग के आवाज़घर  में मौज़ूद उसका चेहरा तलाशती है। दुबला पतला शरीर लिए हमे स्पीड पोस्ट की स्लिप थमा जाता है । स्कूल का ही कोई याडी है, सायद हमसे एक दर्जे आगे था ,पढ़ाई और उसमे एक बालिश का फासला हमेसा रहता था । एक नंबर मस्तीखोर ,या यूँ कहूँ की अव्वल दर्ज़े का ऐडा। यूँ तो मुझे हमेसा लगता था, की स्कूल में वो पहला होगा जिसने सिगरट का कश लिया होगा ,और हवा में छल्ला बना खुद की पीठ थपथपाई होगी। समय के फासले कुछ चेहरों पर जल्दी असर डालते हैं । वो काम को बड़ी शिद्दत से कर रहा है । एक बार मेरी ओर देखा भी नहीं । पर ख़ुशी है उसके और काम के बीच में एक अदृश्य पर मज़बूत रिस्ता पनप रहा है । मेरी आँखे केवल उसके सिगरट के डब्बे को तलाश रही हैं । पर दूर तक बस काम और काम के टीले हैं ।
(ज़िन्दगी खुद में एक बड़ा ऐब है ,ये लगा तो बाकी सब ऐब छुट ही जातें हैं ,,,पीछे...... ,बहुत पीछे)
कुछ एक आत किरदार और भी है ....पर फिर कभी लिखेंगे ......
   

Sunday, January 25, 2015

बनारस ,और साली ज़िन्दगी

बनारस का नाम  सुने हो ....अरे पूछ  रहे हैं ..सुने हो या नहीं। सुने हो तो आगे बात शुरु करें ,,, नहीं  सुने हो तो भी बात होगी ही , बस होगा यूँ की तुम्हरा नौसिखए सा चेहरा कभी अनुभवी न हो पायेगा ,अम्मा अब रहने दो बात शूरु कर ही देते हैं ....
तो बात ये थी की उसकी बनारस से कोई ख़ास दुश्मनी न थी। न ना ऐसा नहीं था  की बिलकुल ही नहीं थी। बस कुछ एक आत पंडो को और अपने बाप को देख कर, उनके सर पर अन्डो की बौछार करने का मन भर होता था । और हो भी क्यों न वो लंबी ,छोटी चोटी वाले, चूहले जैसा मुह लिए हर जगह अपनी रोटी सेकने को तैयार हो जाते थे।वैसे पंडो से यूँ दुष्मनाइ पालने के उसके पास व्यक्तिगत कारण भी थे  । लड़की को घाट बेहद पसंद थे ,इतने की उसने घाट घाट का पानी गटक रखा था ।

पिताजी लड़कियों से खार खाये बेठे थे । या यूँ कहूँ की,,अपनी लड़कियों से खार खाये बेठे थे ।दूसरे की हो तो  लार टपक ही जाती थी । लड़की ठहरी ज़िद्दी ,विद्रोही ,वो क्या है न कॉलेज में नारीवादी समूह के बड़े बड़े भाषण उसे नारी होने का अभूतपूर्व अहसास कराते थे ।वो कई बार अपनी सुन्दर काया को घर आ दर्पण में देखती थी ।अक्सर यूँ कॉलेज से आने के बाद ही होता था ।लड़की का रॉब इतना की मोहहले वाले भी घबराते थे ।लौंडे  तो उसको देख सूखे पीपल के पत्ते की तरह खुद को सिकोड़ लेते थे। पर लड़की शुरू से ऐसे कभी नहीं थी ।एकदम शुशील ,पूजा पाठ वाली हंसमुख लड़की,मतलब कुल जोड़ निकालो तो मोहल्ले में मौज़ूद  अच्छे घर की अच्छी बिटिया।फिर परिवर्तन की ऐसी हवा चली की उसके पाँव ज़मीन पर न टीके, पर माँ बाप के घुटने ज़रूर टिक गए ,पिताजी के तो टूट भी गए  समझाते बुझाते ।अब पिताजी आम की छड के सहारे जीवन सरका रहे है। या यूँ कह लो की मौत को टरका रहे हैं।अरे मूल प्रशन से तो हम भटक ही गए ,हाँ तो हम कह रहे थे की ।लड़की इतनी गतिमान कैसे हो गयी।
असल बात सिर्फ इतनी भर थी  की एक रोज़ बचपन की कोई घिस्सी पिटी या यूँ कहूँ की एकदम रगड़ी हुई बात उसे पता चली।अब बात कितनी भी रगड़ी हो ,अगर पहली बार कानो पर टकराई है, तो तगड़ी ही होती है। और ये उस रोज़ हुआ, जिस दिन वो अपनी सहेली के हक़ के खातिर उसकी माँ से भीड़ भिड़ा गयी ।और फिर क्या था माँ तैश में  बड़बड़ा गयी .,,अच्छा होता तेरी माँ तुझे उस रोज गंगा में डूब जाने देती ।बात पर बात निकली तो  ऑन्टी के मुख से बातों की पूरी त्रिवेणी  बहार आ गयी ।वो हुआ यूँ था की लड़की जब पैदा हुई तो बेहद खूबसूरत थी ,तब तक ,जब तक की एक पण्डे ने ना बोला ,की लड़की मूल नक्षत्र में हुई हानिकारक् है ।बस फिर क्या था कुछ देर माँ ,पिताजी डर के काँपे और फिर सीधे घाट की ओर कदमताल कर दी।नाव वाले को तय किराए से 1000 रूपए ज्यादा दिए । बाकी वो खुद ही समझ गया। पंडत महासय भी तड़के सुबह 4 बजे नाव में सवार  ,मंत्रो उच्चारण कर अपने बुट्टकों को उछाल  अपनी मोटी दक्षिणा की प्रतीक्षा करने लगे। उपाय अनुसार ,बीच नदी में नाव थोडा ठहरी, और माँ ने बिटिया को गंगा के हवाले कर दिया ।अब जैसा की हम जानते ही हैं ।लड़की पहले से ही विद्रोही थी,तो मौत को भी दागा दे गयी ।साथ में पानी में गोता खा,  दो लड्डू ले आई वो अलग ......हलाकि लड्डू में दुनिया भर की फफूंद लगी थी .......पर था तो भगवान् का आर्शीवाद ही, तो प्रसाद समझ सबने थोडा थोडा चाट लिया ....और अगले रोज़  खाट पकड़ ली ....माँ ने इतनी उलटी की ,की लोग उलटी उलटी बातें करने लगे....हलाकि उसके न डूबने के  पीछे इतना भर कारण था की बच्चे माँ के पेट में ही तैरने की कला से पारंगत होते हैं ।पर यहाँ भी पंडित जी ने अपने को सीद्ध करने हेतु ,उसको चम्तकार की संज्ञा दी और लड़की को तुरंत ऊपर खींच  लिया।

बस वो दिन था और आज का दिन है ।,लड़की में चमत्कारिक परिवर्तन आने का सिलसिला अनवरत जारी है । जिस चीज़ को लोग मना करे ,समाज़ गलियाय, वो वर्जनाये तोड़ बस उन गलियों में सरपट दौड़ना चाहति है ...और हाँ रपटना भी चाहती है। चोट का तो कतई डर नहीं ।बस एक ही लब्ज़ है जुबान पर हट साली ज़िन्दगी।


[कहानी 1990 के दसक की है ,सत्य है वो अलग है ]







Wednesday, January 21, 2015

हमने उसके हाथ से मोहब्त के दो घुट क्या गड़प लिए 
पुस्तैनी दिल से उसने हमारे सारे नक्काशी दार सपने हड़प लिए।